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    <title>Sapt Rashmi - Voice of the soul seekers from india</title>
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    <description>Recent content on Sapt Rashmi - Voice of the soul seekers from india</description>
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    <item>
      <title>नगरी हो मधेपुर सी</title>
      <link>https://saptrashmi.kapilkanan.org/2024/02/nagari-ho-madhepur-si/</link>
      <pubDate>Thu, 08 Feb 2024 15:57:15 +0000</pubDate>
      
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        <description>&lt;p&gt;&lt;center&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;img src=&#34;https://saptrashmi.kapilkanan.org/images/uploads/29136178_575993266095307_7262283983205134884_n.jpg&#34; alt=&#34;sri gurudev yogarshi sri kapil&#34; /&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;नगरी हो मधेपुर सी, मंडप का कोना हो ।
जहाँ चरण हों गुरुदेव के, वहाँ मेरा ठिकाना हो ॥१॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;प्रातः की आरती हो, महाकाल का पूजन हो ।
संध्या की आरती से, दिन मेरा समापन हो ॥२॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;अभिषेक हो महादेव का, जहाँ हवन हो यजन हो ।
गुरुदेव का सानिध्य हो, श्रद्धा पुष्प अर्पण हो ॥३॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;ग्रंथों की रचना हो, आध्यात्म की गंगा हो ।
कलि काल के दोष जहाँ, निर्मल हो चंगा हो ॥४॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;महाकाल का पीठ जहाँ, महाकाली तप करती ।
विषय विष को जहाँ, विष से अमृत करती ॥५॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;जिन चरणों की धूलि से, त्रिताप छूट जाए ।
जीवन अमृत हो कर, सारे बंधन टूट जाए ॥६॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;गुरुदेव की वाणी से, मेरी नींद खुल जाए ।
निर्वाण सहज जिनके, चरणों में मिल जाए ॥७॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;सर्वस्व समर्पण हो, जीवन ये अर्पण हो ।
गुरुदेव के चरणों में, विवेक का (मेरा ये) वंदन हो ॥८॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;img src=&#34;https://saptrashmi.kapilkanan.org/images/uploads/sri_gurudev_sitting_1.jpeg&#34; alt=&#34;sri gurudev yogarshi sri kapil&#34; /&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;/center&gt;&lt;/p&gt;
</description>
      
    </item>
    
    <item>
      <title>आदमी</title>
      <link>https://saptrashmi.kapilkanan.org/2022/05/aadami-poem/</link>
      <pubDate>Sun, 22 May 2022 12:16:11 +0000</pubDate>
      
      <guid>https://saptrashmi.kapilkanan.org/2022/05/aadami-poem/</guid>
      
        <description>&lt;p&gt;&lt;center&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;img src=&#34;https://saptrashmi.kapilkanan.org/images/uploads/eyes-close-baby-laughing.jpg&#34; alt=&#34;&#34; /&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;आदमी है&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;हार जाता है कभी - कभी&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;कभी अपनों से&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;कभी खुद से&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;कभी अपनी आदत से&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;कभी अपने अहंकार से&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;कभी अपनों की जिद्द से&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;कभी हालत से&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;कभी जज्बात से&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;कभी तकरार से&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;कभी मैले मन से&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;कभी गंदे प्राण से&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;कभी कुबुद्धि से&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;कभी कुतर्क से&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;कभी डर से&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;कभी इससे&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;कभी उससे&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;तो कभी सबसे..&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;br&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;लेकिन आदमी है&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;तो समझौते कर लेता है&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;और फिर से हार जाता है ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;/center&gt;&lt;/p&gt;
</description>
      
    </item>
    
    <item>
      <title>इस असार संसार से पार</title>
      <link>https://saptrashmi.kapilkanan.org/2022/05/is-asar-sansaar-sepaar/</link>
      <pubDate>Sun, 22 May 2022 11:58:06 +0000</pubDate>
      
      <guid>https://saptrashmi.kapilkanan.org/2022/05/is-asar-sansaar-sepaar/</guid>
      
        <description>&lt;p&gt;&lt;center&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;img src=&#34;https://saptrashmi.kapilkanan.org/images/uploads/man-walking-thoughtfully.jpg&#34; alt=&#34;&#34; /&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;जिंदगी की भागदौड़&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;खुशी और गम की लुकाछिपी ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;मन का कसैलापन&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;और, और पाने की आपाधापी ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;br&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;रात दिन गुजरते हैं यहां&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;खुशियों का पता ढूंढते ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;खुश रहें हमेशा ही हम&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;सब यही सोचा करते ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;br&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;खुशी मिलती और छिनती&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;फिर से क्षणिक खुशी ढूंढा करते ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;अपने अपने बर्तन सभी&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;ज्यादा पाप, थोड़े पुण्य से भरा करते ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;br&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;अपनी खुशी के लिए यहाँ&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;सभी अपनों का गला काटते ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;मन मैला पर कपड़े साफ&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;नैतिकता पर पैबंद  साटते ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;br&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;चकाचौंध करने वालों के&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;भीतर घना अंधेरा रहता ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;बाहर सबकुछ ठीक ठाक&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;पर भीतर सड़ा कचरा रहता ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;br&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;अपने कचरे को हर कोई&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;सीधा खड़ा सोना कहता ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;दुर्गंध के आदी, जन्म जन्म से&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;अपनी कस्तूरी को सपना कहता ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;br&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;परस्त्री, परपुरुष मिलाप को&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;आधुनिकता का आवरण है यहां ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;सतीत्व और मर्यादा से परे&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;नर, नारी का आचरण है यहां ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;br&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;अनैतिक कामांधता को ही&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;सच्चा प्रेम अब यहां कहते ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;रिश्ते नातों को ताक पर रख&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;ये कामदेव को शर्मसार करते ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;br&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;कुतर्क करने में माहिर&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;कुबुद्धि के दास हैं ये ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;अपकर्म को सत्कर्म कहें&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;कलियुग के भी बाप हैं ये ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;br&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;परमेश्वर भी इन्हें&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;इनके ही जैसा चाहिए ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;खुद को न बदलेंगे ये कभी&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;इन्हें सबकुछ इनके शर्तों पर चाहिए ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;br&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;कबीर को घोड़े से घसीटा&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;इन्होंने ईसा को सूली पर लटकाया ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;सुकरात को भी जहर दिया इन्होंने&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;और मंसूर को काफिर बतलाया ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;br&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;किसी ने कृष्ण को मारना चाहा&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;किसी ने राम की सीता छीनी ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;वेश बनाकर दरवेशों सा&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;घूम रहे यहां कई कालनेमी ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;br&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;इन्हें रौशनी नहीं पसंद&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;ये अंधेरों के आदी हैं ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;सारे कुकर्म करने के बाद&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;ये सुख से सोने के आदी हैं ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;br&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;मानव मानवता भूल चुका है&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;पशुता का अंध अनुकरण होता ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;पाप के नवीन समीकरण गढ़ करके&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;दुराचार का नित नवीकरण होता ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;br&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;दूध की बाढ़ तो सचमुच आई थी&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;पर कोहरे का ये देश भी है ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;यहां आंखों पर पट्टी बंधी हुई सबके&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;और हृदय विषाक्त विशेष ही है ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;br&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;फिर कभी नहीं आना हो यहां&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;इस कुटिल संसार में ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;इस घने कुहासे में&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;इन बेइमानों के बाजार में ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;br&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;हे करुणामय, हे गुरुदेव&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;आपसे प्रार्थना है बारंबार ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;हाथ पकड़, हमें साथ ले चलें&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;इस असार संसार से पार ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;/center&gt;&lt;/p&gt;
</description>
      
    </item>
    
    <item>
      <title>आगे को आगे आ जाने दो</title>
      <link>https://saptrashmi.kapilkanan.org/2022/05/aage-ko-aage-aa-jaane-do/</link>
      <pubDate>Sat, 21 May 2022 01:05:45 +0000</pubDate>
      
      <guid>https://saptrashmi.kapilkanan.org/2022/05/aage-ko-aage-aa-jaane-do/</guid>
      
        <description>&lt;p&gt;&lt;center&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;img src=&#34;https://saptrashmi.kapilkanan.org/images/uploads/woman_praying.jpg&#34; alt=&#34;&#34; /&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;तुम जब ठानते हो&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;कुछ कर गुजरने की ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;तुम जब सोचते हो&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;ऊपर उठने की ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;br&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;बस कर गुजरो तुम&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;बाँकियों  को अभी सोचने दो ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;ये दुनियां है, यूँ ही रहेगी&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;गुलामों को चक्की पीसने दो ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;br&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;पतझड़ को पीछे ही छोड़कर&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;वसंत का आगमन हो जाने दो ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;तूफान तो यूं ही आते - जाते&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;अब असंभव को संभव हो जाने दो ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;br&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;तुम्हारे पग अब वामन से हैं&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;खुद को विराट बन जाने दो ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;संसार की पोटली उसी को थमा कर&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;खुद को वैरागी बन जाने दो ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;br&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;जन्म - जन्म की तकलीफों पर&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;अब तो मरहम लग जाने दो ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;गुरु कृपा का अमृत पीकर&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;अब तो अमर हो जाने दो ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;br&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;दुनियाँ को खुद पर हँसने दो&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;अपनों को शिकायत हो जाने दो ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;पीछे तो पीछे ही रह गया&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;आगे को आगे आ जाने दो ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;/center&gt;&lt;/p&gt;
</description>
      
    </item>
    
    <item>
      <title>श्री गुरुदेव कवच</title>
      <link>https://saptrashmi.kapilkanan.org/2021/12/sri-gurudev-kavach/</link>
      <pubDate>Sun, 26 Dec 2021 17:33:51 +0000</pubDate>
      
      <guid>https://saptrashmi.kapilkanan.org/2021/12/sri-gurudev-kavach/</guid>
      
        <description>&lt;p&gt;&lt;center&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;img src=&#34;https://saptrashmi.kapilkanan.org/images/uploads/29136178_575993266095307_7262283983205134884_n.jpg&#34; alt=&#34;sri gurudev yogarshi sri kapil&#34; /&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;श्री गुरुदेव कवच&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;हे गुरुदेव, आप सर्वसमाधिसिद्ध होकर भी साधारण मनुष्य की भाँति लोक - व्यवहार करने वाले, पात्र – अपात्र का भेद न देखते हुए जीवों को अपने संकल्प मात्र से परमगति प्रदान करनेवाले, संसार के लोगों के द्वारा न पहचाने जाने वाले, योगर्षि श्रीकपिल नाम से प्रसिद्ध, अपने अनन्त स्वरुप को शिष्यों से भी छुपाने वाले, आर्तजनों के दुखों को, उनके अपकर्मों के कष्टप्रद भोगों को, अपने संकल्प से दूर कर और उस नारकीय भोग को स्वयं भोगने वाले, आप परमेश्वर को मैं प्रणाम करता हूँ, प्रणाम करता हूँ ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;हे गुरुदेव, समस्त दर्शन, विभिन्न प्रकार से आपके तरफ ही इशारा कर शांत हो जातें हैं और आपके ही विभिन्न रुपों की अलग – अलग प्रकार से व्याख्या कर, सिद्धि प्रदान करतें हैं । उनके द्वारा प्राप्त होने वाले आपके विभिन्न स्वरुपों का ज्ञान और समधियाँ सहज ही आपके चरणों में प्राप्त हो जातें हैं, और फिर भी साधकगण, इन सभी दर्शनों से परे आपके परम स्वरुप को नहीं जान पाते, आपके निकट रह कर भी आपके निकट नहीं पहुंच पाते, और सिर्फ आपकी कृपा मात्र से समस्त बाधाओं को पार कर, आपके उस परम स्वरुप को जान कर समस्त बंधनों से मुक्त हो जातें हैं । हे समस्त बंधनों से मुक्त करनेवाले, अपनी कृपामात्र से जीव और ब्रह्म भाव दोनों का ही क्षणभर में नाश करने वाले, ज्ञानियों के ज्ञान को ही उनके लिए बंधन स्वरुप बना कर अपने परम स्वरुप तक नहीं पहुंचने देने वाले, मंद – मंद मुस्कुरा कर – “मैं बहुत बीमार हूँ और देखिये कितनी औषधियों का सेवन करता हूँ” ऐसा कह कर अपने परमेश्वर, परात्पर स्वरुप को जन सामान्य से छुपाने वाले, मैं सभी प्रकार से आपके ही चरणों का आश्रय लेता हूँ । आप सभी तरह से मेरी रक्षा करें, मेरी रक्षा करें और अपने परम स्वरुप में लय कर लें, लय कर लें ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;हे गुरुदेव, आपके परम कृपा से आपके दिव्यातिदिव्य, अन्धकार और प्रकाश से परे, मन, बुद्धि, प्राण आदि समस्त प्रकृति एवं प्रकृति से परे अक्षय, अभय, अकर्ता, ब्रह्म के दिव्य अहंकार से युक्त पुरुष, इन दोनों ही से परे जो आपका स्वरुप है, जिसे कोई नहीं जानता, जिसे कुछ भी नहीं कहा जा सकता, जहाँ परम शाँति भी शाँत हो जाती है, जिसके बारे में कुछ लिखा नहीं जा सकता, जहाँ प्रकृति से परे वो प्रसिद्ध पुरुष अपने दिव्य अहंकार को त्याग कर लय कर जाता है और फिर कहने – सुनने को कुछ भी शेष नहीं रह जाता, जहाँ समस्त दर्शन, मार्ग, पंथ, धर्म कुछ भी नहीं पहुँच पाते, शिशु के समान तोतला कर अस्पष्ट और अस्फुट, अपूर्ण से हुए बस नेति – नेति का इशारा करते रह जातें हैं, उस परम स्वरुप को मैं दोनों हाथ जोड़े बारम्बार प्रणाम करता हूँ, प्रार्थना करता हूँ । मुझे अपने इसी स्वरुप में लय कर सदैव, सर्वदा के लिए मुक्त करें, मुक्त करें । मैं अपने इसी परम स्वरुप में जग कर आपको हमेशा - हमेशा के लिए प्राप्त हो जाऊँ ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;हे अनंतानंत सूर्यों के सदृश्य धवल ज्योति से प्रकाशित, परम शांत, शान्ति को भी शांत कर देने वाले, हे गुरुदेव, हम जब आपके उपनिषद के शान्ति पाठ को पढते समय धवल ज्योतिर्मय शांत ब्रह्म को नमन कर रक्षण के लिए प्रार्थना करतें हैं, आपके परम कृपा से यह बोध होता है कि, वो धवल ज्योति वाले, निराकार, शांत ब्रह्म आपमें ही लय हैं आप उनसे भी अलग हैं  जिसे कोई नहीं जानता। शिष्यों को त्रिताप से रक्षित करने हेतु, समस्त उपद्रवों का शमन करने हेतु, दुखों का समूल विनाश करने के लिए आप से ही उन धवल ज्योतिर्मय शांत ब्रह्म का प्रकाट्य होता है जो समस्त पाप – ताप को शान्त करने वाले हैं । और जैसे पलाण्डु को छीलते  जाने पर अंत मे कुछ नहीं बचता वैसे ही आप प्रकाश और अंधकार से सर्वथा परे हैं । मैं आपसे सर्व प्रकार से सदैव रक्षित होऊँ, रक्षित होऊँ । मेरे समस्त पाप – ताप, रोग – व्याधि – शोकादि, क्रूर ग्रहादि प्रकोप, सभी प्रकार के अभिचार कर्मादि, अन्धकार के लोकों एवं पृथ्वी लोक पर उनके अनुयायियों के द्वारा किए जाने वाले आक्रमण, सभी प्रकार के भयादि को सदैव के लिए शांत कर दें, शान्त कर दें ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;हे गुरुदेव, आप विभिन्न यज्ञ, हवन आदि के समय, अपने ही संकल्प शक्ति का विभिन्न रुपों में यजन करवा कर हजारों – हजारों आत्माओं का उद्धार करतें हैं, उन्हें सद्गति प्रदान करतें हैं, निर्वाण देतें हैं, अपने परात्पर, परम स्वरुप में लय कर लेतें हैं। आप अपने हाथों में कुश, तिल, जल आदि लेकर यज्ञ से पूर्व संकल्प लेतें हैं, और आपकी दिव्यातिदिव्य संकल्प शक्ति उसे तत्क्षण पूर्ण  करने को उद्यत हो जाती है । आप अपने शिष्यों के आध्यात्मिक उत्थान के लिए संकल्प लेतें हैं, आत्माओं के निर्वाण के लिए संकल्प लेतें हैं, देवताओं के कार्य को पूर्ण करने हेतु संकल्प लेतें हैं, पृथ्वी पर प्रकाश के अवतरण के लिए संकल्प लेतें हैं और वो सारे दिव्य संकल्प तत्क्षण पूर्ण होतें हैं । हे सत्य संकल्प स्वरुप, हे गुरुदेव आप के महान तप, संकल्प और तेज से मैं सभी प्रकार से रक्षित होऊँ, रक्षित होऊँ, निर्वाण पाऊँ, परम गति पाऊँ ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;हे गुरुदेव, हे पिता, हे स्वामी, अन्धकार के जीवों से भरे इस संसार में मुझे अकेला न छोड़ें । कपट, छल, षड्यंत्र आदि तम, रज आदि से भरे और अन्धकारपूर्ण चित्त वाले जीव, अपने अहंकार, दम्भ – दर्प, शक्ति, धन, बाहुबल, बुद्धिबल आदि के मद में चूर, विभिन्न प्रकार से मुझे कष्ट देनेवाले इन जीवों के उपद्रव को, दैहिक, दैविक और भौतिक ताप से, मुझ असहाय, निर्बल और सभी प्रकार से आपके ही चरणों पर आश्रित मुझ दीन – हीन शिष्य की आप सभी प्रकार से रक्षा करें, रक्षा करें । कृपा करें, कृपा करें ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;हे प्रभु, अपने इस शिष्य के साधना को विभिन्न प्रकार के विघ्न, विक्षेप, प्रहार और उपद्रवों से मुक्त कर उसकी भव बाधा को दूर करें, दूर करें । साधना को पूर्ण करें, पूर्ण करें । हे गुरुदेव, त्रिगुण में गोते लगाते हुए, सत – रज – तम के झंझावात सहते हुए, अपने इस शिष्य को आप अपने शरण में लें, शरण में लें । आपने कितने ही जीवों को निर्वाण देकर अपने परम स्वरुप में लय किया है, मुझ अधम को भी अपने स्वरुप में लय कर लें, लय कर लें । हे समभाव और समदृष्टि में स्थित होकर लोक व्यवहार करने वाले, अपनी बेधक कृपादृष्टि से समस्त दुखों का नाश करने वाले, मेरी इस संसार यात्रा को सुगम बनाएँ, सुगम बनाएँ और मेरे इस अनंत और विकट भटकाव को यहीं पर विराम दें, विराम दें । इस मृगमारीचिका और मेरी मृगतृष्णा का अब अंत करें, अंत करें ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;हे शरणागत वत्सल, आप बिना कारण ही मुझ जैसे अपात्र, अधम और बार – बार अपने पथ से भटकने वाले, जलकुम्भी के पुष्प की तरह जिसका कोई उपयोग न हो ऐसे मुझ नराधम को, जो भक्ति, भाव , प्रेम, ज्ञान आदि से सर्वथा रहित है, अपना शिष्य बनाकर, अपने चरणों की धूलि देकर, हे गुरुदेव, मुझ पर ऐसी कृपा की है जिसका वर्णन करना असंभव है । जिस प्रकार हाथी पुन: - पुन: स्नान करके सरोवर से बाहर निकलता है और पुन: अपने आपको धूल – धूसरित कर लेता है, हे प्रभु ठीक उसी प्रकार से मैं भी आपके परम कृपा से, आपके परम स्वरुप के चिन्तन मे लीन होकर भी, पुन: मैं संसार के रसों का पान करने लगता हूँ । हे पतित पावन, मुझ कमजोर और क्षीण संकल्प वाले अपने इस शिष्य को अब तार दें, तार दें । हे तारणहार, भवसागर में गोता लगता मैं, अपने समस्त बल, पराक्रम और ज्ञान – भक्ति आदि से किसी भी प्रकार पार नहीं पा रहा और बोध हो रहा की अब आप ही मेरे मार्ग, मेरी मंजिल, मेरी गति हैं । मेरे पास आपकी ठीक प्रकार से स्तुति करने का कौशल नहीं, व्याकरण आदि का ज्ञान नहीं, और न ही मैं भक्ति, प्रेम, ज्ञान, योग आदि से ही विभूषित हूँ । हे नाथ, अब आप ही मेरी स्तुति, आप ही मेरा व्याकरण, आप ही मेरा प्रेम, आप ही मेरा ज्ञान, और आप ही मेरे योग हैं । हे गुरुदेव, अब आप ही मेरा विश्वास, आप ही मेरे संबल हैं । मेरी समस्त गति, कर्म, विचार, भाव, साधना, मेरा ये अनन्त जीवन, अब आप में ही विश्राम पा रहा । मेरे जन्म जन्मान्तर के समस्त अपराधों को हे करुणार्नव क्षमा कर दें । हे गुरुदेव, अब विलम्ब मत किजिये, अब मुझे अपने अनन्त स्वरुप में सदैव के लिए विश्राम दिजिये ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;श्रीगुरुदेव कवच माहात्म्य :-&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;माता महाकाली के दिव्य सुनहले प्रकाश से अलोकित वातावरण, और श्रीगुरुदेव के द्वारा तीन गुलाब के पुष्पों को इस कवच पर रख कर सिद्ध और फलित होने के आशिर्वाद से युक्त, योगर्षि श्रीकपिल के दिव्य प्रेम और कृपामृत से सिन्चित, श्री गुरुदेव का यह अमोघ कवच, शिष्यों – श्राद्धालुओं के द्वारा सेवित होकर उनके त्रिताप, क्लेश – उपद्रव, भय, आदि को तत्क्षण नष्ट कर, रोगादि से मुक्ति, उनके साधना, आध्यात्मिक उत्थान में सहायक होकर, मनोवांछित फल प्रदान करने के साथ – साथ, शीघ्र ही परम शुद्धि, परम गति प्राप्त करने में सहायक होगा ।
योगर्षि श्रीकपिल के परम कृपा, दिव्य प्रेम और उनके द्वारा प्रशस्त दिव्य ज्ञान का रसास्वादन कराते हुए, सभी प्रकार से रक्षा करेगा ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;/center&gt;&lt;/p&gt;
</description>
      
    </item>
    
    <item>
      <title>आज तो बस आज में रहो</title>
      <link>https://saptrashmi.kapilkanan.org/2021/11/aaj-to-bas-aaj-me-raho/</link>
      <pubDate>Tue, 16 Nov 2021 07:56:18 +0000</pubDate>
      
      <guid>https://saptrashmi.kapilkanan.org/2021/11/aaj-to-bas-aaj-me-raho/</guid>
      
        <description>&lt;p&gt;&lt;center&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;img src=&#34;https://saptrashmi.kapilkanan.org/images/uploads/baby-seeking.jpg&#34; alt=&#34;baby seeking path&#34; /&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;आज तुम अपने आप से बात करो&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;आज तुम अपने साथ रहो दिनभर ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;आज तुम खुद के लिए ही सोचो&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;आज जगो अपने साथ रातभर ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;आज कुछ अपने लिए ही करो&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;आज तुम अँधेरे में न रहो ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;आज ही अपना दीपक जलाओ&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;आज जीवन को प्रकाशित तो करो ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;आज खुद का इलाज करो तुम&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;आज ही अपनी सफाई करो ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;आज अपने चित्त को निहारो तुम&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;आज दुर्गुणों से लड़ाई करो ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;आज तो अपनी भी न सुनो&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;आज तुम्हारा जीवन दिव्य हो ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;आज का सूरज तुम्हारे लिए ही निकला है&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;आज तो बस रौशनी को ही चाहो ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;आज सुख - दुःख को छोड़ो तुम&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;आज अपने आनन्द में मगन रहो ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;आज का चाँद सिर्फ तुम्हारे लिए है&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;आज सिर्फ अपने आँगन रहो ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;आज बस खुद से झूठ मत बोलो&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;आज तो खुद से लड़ कर मरो ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;आज भूत - भविष्य की चिंता छोड़ो&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;आज तो बस आज में रहो ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;img src=&#34;https://saptrashmi.kapilkanan.org/images/uploads/woman-sunrise.jpg&#34; alt=&#34;woman sunrise&#34; /&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;/center&gt;&lt;/p&gt;
</description>
      
    </item>
    
    <item>
      <title>मंजिल आखिरी वही श्मशान ही होगा</title>
      <link>https://saptrashmi.kapilkanan.org/2021/11/manjil-aakhiri-vahi-shamshan-hi-hoga/</link>
      <pubDate>Sun, 07 Nov 2021 06:05:29 +0000</pubDate>
      
      <guid>https://saptrashmi.kapilkanan.org/2021/11/manjil-aakhiri-vahi-shamshan-hi-hoga/</guid>
      
        <description>&lt;p&gt;&lt;center&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;img src=&#34;https://saptrashmi.kapilkanan.org/images/uploads/baby_showing_tongue.jpg&#34; alt=&#34;baby girl showing tongue&#34; /&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;तुम जब पैदा होकर आए&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;मात पिता कुटुम्ब हर्षाए ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;लोगों ने बधाइयाँ  भेजीं&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;सबने मिलकर सोहर गाए ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;जब तुम जग को छोड़ जाओगे&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;कुछ लोग तुम्हारे लिए रोयेंगे ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;कुछ दिन तक घर में मातम होगा&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;फिर सब तुमको भूल बैठेंगे ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;तुम कौन हो ये पता नहीं तुम्हें&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;औरों का पता तुम पूछ रहे ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;मानव, मन को रोक कर देखो&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;कहाँ - कहाँ तुम भटक रहे ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;दर्शन की विवेचना करके&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;मुक्त कोई नहीं होता है ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;जैसे पिंजरे का तोता कभी&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;आसमान में नहीं उड़ता है ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;प्रेम की परिभाषा से&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;बंशीधर नहीं मिलतें हैं ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;कमजोर अभिलाषा से जैसे&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;कभी योग नहीं सधते हैं ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;वैध जी की दवा भी तो&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;खाने से ही काम करती है ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;लेकर घर मे रख लेने से भर&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;रोग को कहाँ आराम करती है ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;आज खुद को इतना तपाओ&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;की तुम कुंदन हो जाओ ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;फिर कब मौका मिलेगा तुम्हें&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;कब काल - कलवित हो जाओ ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;हँसने दो तुम दुनियाँ को&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;जी भर कर कोसने दो ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;खुद को बदल डालो तुम आज ही&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;बांकियों को अभी सोचने दो ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;क्यूँ इतराते तुम्हारे पास मक्खन है&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;अरे उसको भी तो मथना होगा ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;घृत की धार तो तभी टपकेगी&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;अग्नि पर उसको भी तो तपना होगा ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;प्रतिपल कठिन अभ्यास से ही&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;तुम खुद से जीतोगे ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;अपनी बेड़ियाँ तुम ही तो हो&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;इसे तुम ही खोलोगे ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;पहले अपनी सुलगी तो बुझा लो&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;फिर औरों की लगी बुझाना ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;पहले खुद को तो समझ लो&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;फिर औरों को समझाना ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;सपने को हकीकत में बदलो&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;वरना यूँ ही रह जाओगे ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;अपने अटूट निश्चय से तुम&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;निश्चित ही विजय पाओगे ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;चित्त की तुम चिता जला लो&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;अमर मृत्यु का आलिंगन करो ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;गुरु चरणों पर निर्भर रहकर&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;अंगार का तुम अंजन करो ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;बहुत व्यस्त रहते हो दुनियाँ में&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;कभी पल भर तो विश्राम करो ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;राम नाम सत्य तो सबका ही होगा&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;आओ आज मरघट में आराम करो ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;अपने सभी कुटिल कर्मों से&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;कुछ देर के लिए ही छुट्टी ले लो ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;प्रभु का नाम तो मुफ्त मिलता है&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;आओ तुम भी घुट्टी पी लो ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;आत्मदेव से मित्रता कर लो&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;आज उनके लिए कुछ काम करो ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;खुद को ठगना छोड़ कर तुम&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;अपने दुर्गुणों का काम तमाम करो ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;किसकी कठपुतली बन चुके तुम&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;क्यूँ कालिमा को ढो रहे हो ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;क्यूँ अपनी आत्मा को हतते तुम&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;क्यूँ दुःख के बीज बो रहे हो ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;दुनियाँदारी में आज कुशल तुम&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;आज अहंकार आसमान पर होगा ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;मत भूलो तुम्हें फिर जाना ही है&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;मंजिल आखिरी वही श्मशान ही होगा ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;img src=&#34;https://saptrashmi.kapilkanan.org/images/uploads/baby_girl_laughing.jpg&#34; alt=&#34;baby girl laughing&#34; title=&#34;baby girl laughing&#34; /&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;/center&gt;&lt;/p&gt;
</description>
      
    </item>
    
    <item>
      <title>मस्तक चन्द्र वस्त्र गेरुआ साजे</title>
      <link>https://saptrashmi.kapilkanan.org/2021/09/mastak-chandra-shish-shikha-viraje/</link>
      <pubDate>Tue, 21 Sep 2021 17:32:18 +0000</pubDate>
      
      <guid>https://saptrashmi.kapilkanan.org/2021/09/mastak-chandra-shish-shikha-viraje/</guid>
      
        <description>&lt;p&gt;&lt;center&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;img src=&#34;https://saptrashmi.kapilkanan.org/images/uploads/82634363_1049980925363203_7810018017659584512_n.jpg&#34; alt=&#34;sri gurudev yogarshi sri kapil&#34; /&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;मस्तक चन्द्र वस्त्र गेरुआ साजे&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;बैठे हैं गुरुवर अविनाशी ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;अगरु कपूर की सुगंधि सुवासित&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;हो रही है संध्या आरती ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;शिष्यों संग बैठे हैं गुरुदेव&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;हो रही ज्ञान की वर्षा सी ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;धवल ज्योति से ज्योतिर्मय हो रहे&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;श्री गुरुदेव हमारे गुणराशी ॥ मस्तक चन्द्र .. ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;दीन - दुखी जन आते - जाते&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;पाते सब सुख आनन्दराशी ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;पतित पावन कलि मल हारण&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;परात्पर ब्रह्म हैं पूर्णराशि ॥ मस्तक चन्द्र .. ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;उनके ही चरणों की धूलि&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;छुड़ा देती यम की फांसी ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;चक्र भेदन कर देते गुरुवर&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;बनाते प्रकाश के अधिवासि ॥ मस्तक चन्द्र .. ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;br&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;निर्मल चरित्र का पाठ पढ़ाते&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;परम पावन वो पवित्रराशी ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;कहते यही ईष्ट उपासना है&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;समझ जाओ हे पृथ्वीवासी ॥ मस्तक चन्द्र .. ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;सम दृष्टि सम भाव सिखाते&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;गुरुदेव हमारे मंडपवासी ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;कहते यही तीर्थ और व्रत है&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;इसके बनो तुम अभ्यासी ॥ मस्तक चन्द्र .. ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;हम शिष्यों की नैया को&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;पार लगाएं हे अनंत, हे कैलाशी ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;हाथ जोड़ हम विनती करते&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;हृदय में रख निज छवि राशि ॥ ॥ मस्तक चन्द्र .. ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;/center&gt;&lt;/p&gt;
</description>
      
    </item>
    
    <item>
      <title>आपके चरणों की धूलि</title>
      <link>https://saptrashmi.kapilkanan.org/2021/09/aapke-charanon-ki-dhuli/</link>
      <pubDate>Mon, 20 Sep 2021 16:39:53 +0000</pubDate>
      
      <guid>https://saptrashmi.kapilkanan.org/2021/09/aapke-charanon-ki-dhuli/</guid>
      
        <description>&lt;p&gt;&lt;center&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;img src=&#34;https://saptrashmi.kapilkanan.org/images/uploads/29136178_575993266095307_7262283983205134884_n.jpg&#34; alt=&#34;sri gurudev yogarshi sri kapil&#34; /&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;आपके चरणों की धूलि&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;हम माथे पर लगायेंगे ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;चल पड़े हैं अब आपकी ओर&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;हम पहुंच ही जायेंगे  ।।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;गुरुदेव आपका मिलना हमें&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;कर चुका हमारा उद्धार ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;एक आप ही सहारा हैं प्रभुजी&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;सुन लीजिए हमारी पुकार  ।। आपके चरणों की .. ।।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;भाव नहीं, न प्रेम ही है&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;न ही हम भक्ति से भरे ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;ज्ञान विज्ञान किसे कहतें हैं&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;हम तो अज्ञानी ठहरे ।। आपके चरणों की .. ।।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;योग याग और साधना&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;हम कुछ भी न कर पाते ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;पेट भरने की चिंता में ही&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;दिन रात बस लगे रहते ।। आपके चरणों की .. ।।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;देखिए हमें भी एक बार&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;हम हैं न किसी भी काम के ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;इस दुनीयाँ ने ठोकर ही मारी&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;और न हो ही सके हम राम के ।। आपके चरणों की .. ।।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;किसी तरह सारे फंदों से&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;दूर हमको कीजिये ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;अपनी परम कृपा करके&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;अब मुक्त हमको कीजिये ।। आपके चरणों की .. ।।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;जंजाल है ये संसार हमारा&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;हम फंस कर न रहें ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;हाथ पकड़ लें आप हमारा&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;हम और दुख अब न सहें ।। आपके चरणों की .. ।।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;योग या फिर भोग जो भी&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;साथ आप हमारे रहें ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;शीघ्र ही हम गति पाएं&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;आप बस करुणा करें ।। आपके चरणों की .. ।।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;मैं बहुत कमजोर हूँ प्रभु&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;अब और लड़ नहीं पता हूँ मैं ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;अपने सारे दुर्गुणों से&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;नित्य ही मुँह की खाता हूँ मैं ।। आपके चरणों की .. ।।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;एकबार आप आइये नाथ&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;त्राण मुझको दीजिये ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;हे करुणानिधान हमारे&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;अब मुझको ज्ञान दीजिये ।। आपके चरणों की .. ।।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;आपके ही आसरे हूँ&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;मैं अधम नालायक बड़ा ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;आप सा न कोई है&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;इस जहाँ में तारक बड़ा  ।। आपके चरणों की .. ।।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;तार दीजिये हमें भी अब&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;विवेक किसी लायक नहीं ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;खुद से कुछ न कर पाएंगे हम&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;है झोली में कुछ भी नहीं ।। आपके चरणों की .. ।।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;/center&gt;&lt;/p&gt;
</description>
      
    </item>
    
    <item>
      <title>अब तो ये समझ भी जाओ</title>
      <link>https://saptrashmi.kapilkanan.org/2021/07/ab-toh-ye-samajh-bhi-jao/</link>
      <pubDate>Tue, 20 Jul 2021 18:19:42 +0000</pubDate>
      
      <guid>https://saptrashmi.kapilkanan.org/2021/07/ab-toh-ye-samajh-bhi-jao/</guid>
      
        <description>&lt;p&gt;&lt;center&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;img src=&#34;https://saptrashmi.kapilkanan.org/images/uploads/baby_opening_mouth_happy_1.jpg&#34; alt=&#34;baby happy&#34; /&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;खोज - खोज कर थक जाओगे&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;फिर भी नहीं मिल पाएगा ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;माला, कंठी, जप, ध्यान धरो&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;पर कुछ भी नहीं हो पाएगा ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;सारे दर्शन उलट - पुलट लो&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;अजी वाद - विवाद कितने भी करो ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;शात्रार्थ जितने भी कर लो&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;दर - दर चाहे जितने फिरो ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;कभी - कभी काशी कभी द्वारका&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;कभी सौराष्ट्र, सोमनाथ जाओ ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;कभी मुरलीधर को कर जोड़ कर&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;कभी कभी हरिद्वार भी हो आओ ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;लाख जतन कर लो कुछ भी&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;आँखें मूंद कर सांसे लो ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;कपड़े बदलो, संन्यासी बन जाओ&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;चाहे खुद को झांसे दो ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;नहीं मिलेगा तुम्हें कुछ भी&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;चाहे जितना जोड़ लगाओ ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;नारेबाजी जितना भी कर लो&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;चाहे जितने आँसु बहाओ ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;चाहते हो क्या तुम&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;खुद को मिटाना ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;अरे, हरि को पाना है&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;खुद हरि हो जाना ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;अपने मलिन स्वभाव को त्यागकर&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;अपना दीपक खुद बन जाओ ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;और देखो कौन किसे ढूंढ रहा&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;अब तो ये समझ भी जाओ ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;img src=&#34;https://saptrashmi.kapilkanan.org/images/uploads/baby_atnotished_happy.jpg&#34; alt=&#34;baby atnotished&#34; /&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;/center&gt;&lt;/p&gt;
</description>
      
    </item>
    
    <item>
      <title>उद्धव, बिसरब कोना हम ब्रज के नेह</title>
      <link>https://saptrashmi.kapilkanan.org/2021/02/udbhav-bisarab-kona-ham-braj-ke-neh/</link>
      <pubDate>Wed, 03 Feb 2021 15:53:59 +0000</pubDate>
      
      <guid>https://saptrashmi.kapilkanan.org/2021/02/udbhav-bisarab-kona-ham-braj-ke-neh/</guid>
      
        <description>&lt;p&gt;&lt;center&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;img src=&#34;https://saptrashmi.kapilkanan.org/images/uploads/krishna_with_friend_2.jpg&#34; alt=&#34;krishna_with_friend&#34; title=&#34;krishna_with_friend&#34; /&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;small&gt;( चित्र साभार - इस्कॉन )&lt;/small&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;माईक कोड़ बाबा के गेह&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;ब्रज गोपिकाक अद्भुत प्रेम&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;गोप सखा सबहक स्नेह&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;उद्धव, बिसरब कोना हम ब्रज के नेह ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;पुलकाबय हमर देहक सभ अंग&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;चिन्मयी राधा केर अलौकिक संग&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;थिर न रहय हमर मन आ देह&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;बिसरब कोना हम ब्रज के नेह ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;गैया मैया संग क्रीड़ा अनंत&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;साओन भादव वा हिम बसंत&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;मानहु स्वर्ग उतरल सदेह&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;बिसरब कोना हम ब्रज के नेह ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;धेनु बेणु माखन मिसरी&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;कहू कोना हम बिसरी&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;स्वाद ओहन आ ओहन सनेह&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;उद्धव, बिसरब कोना हम ब्रज के नेह ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;/center&gt;&lt;/p&gt;
</description>
      
    </item>
    
    <item>
      <title>माधव, जीवन भेल व्यर्थ व्यतीत</title>
      <link>https://saptrashmi.kapilkanan.org/2021/02/maadhav-jeevan-bhel-vyarth-vyatit/</link>
      <pubDate>Wed, 03 Feb 2021 15:18:40 +0000</pubDate>
      
      <guid>https://saptrashmi.kapilkanan.org/2021/02/maadhav-jeevan-bhel-vyarth-vyatit/</guid>
      
        <description>&lt;p&gt;&lt;center&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;img src=&#34;https://saptrashmi.kapilkanan.org/images/uploads/old_man_alone_1.jpg&#34; alt=&#34;old_man_sitting_alone&#34; title=&#34;old_man_sitting_alone&#34; /&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;small&gt; चित्र साभार - अनस्प्लैश &lt;/small&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;माधव, जीवन भेल व्यर्थ व्यतीत&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;बहु-विकल्प, विषय, व्यसन में&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;डूबल अछि हमर अतीत&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;जीवन भेल व्यर्थ व्यतीत ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;नेह-बन्ध के मोह प्रबलता&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;आकर्षण रस रसनाक सबलता&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;मेटलक सभ सत्य प्रतीति&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;जीवन भेल व्यर्थ व्यतीत ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;ओझल मन सं रहल मायावश&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;भजनानन्दक दिव्य  अमृतरस&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;प्रभु चरण सं भेल नहिं प्रीत&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;जीवन भेल व्यर्थ व्यतीत ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;वरण नहिं कएल प्रभु के आनंद&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;चिन्मय निर्झरणी परमानंद&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;रहल विरत जीवन संगीत&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;जीवन भेल व्यर्थ व्यतीत ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;img src=&#34;https://saptrashmi.kapilkanan.org/images/uploads/old_man_alone_2.jpg&#34; alt=&#34;old_man_sitting_alone_2&#34; title=&#34;old_man_sitting_alone_2&#34; /&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;small&gt; चित्र साभार - अनस्प्लैश &lt;/small&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;/center&gt;&lt;/p&gt;
</description>
      
    </item>
    
    <item>
      <title>हे ऊधो, ब्रज नहिं बिसरल जाय</title>
      <link>https://saptrashmi.kapilkanan.org/2021/02/hey-udho-braj-nahin-bisaral-jay/</link>
      <pubDate>Wed, 03 Feb 2021 14:48:55 +0000</pubDate>
      
      <guid>https://saptrashmi.kapilkanan.org/2021/02/hey-udho-braj-nahin-bisaral-jay/</guid>
      
        <description>&lt;p&gt;&lt;center&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;img src=&#34;https://saptrashmi.kapilkanan.org/images/uploads/krisha_with_friend.jpg&#34; alt=&#34;krishna_with_friend&#34; title=&#34;krishna_with_friend&#34; /&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;small&gt;चित्र साभार - इस्कॉन&lt;/small&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;हे ऊधो, ब्रज नहिं बिसरल जाय&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;मायातीत हम भनहिं कहाबी&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;ब्रज माया ने बिसराय&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;हे ऊधो, ब्रज नहिं बिसरल जाय ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;मैया यशोदा के अपरूब ममता&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;भेटय कतय ओहन रूचि रमता&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;माखन मिसरी नहि मोन सं जाय&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;हे ऊधो, ब्रज नहिं बिसरल जाय ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;ब्रज जन रेणु गोप संग धेनु&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;हंसैत खेलाइत बजावति वेणु&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;दृश्य  एक एक मोन पड़ि जाय&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;हे ऊधो, ब्रज नहिं बिसरल जाय ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;प्राणहुं सं अधिक गोपिका प्रेम&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;हुनक नहिं बूझी कुशल आ क्षेम&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;छन - छन युग सम बीतल जाय&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;हे ऊधो, ब्रज नहिं बिसरल जाय ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;राधा संग हमर अलौकिक राग&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;संग - संग यमुना ताल तड़ाग&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;सभटा ओहिना छन छन सुझाय&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;हे ऊधो, ब्रज नहिं बिसरल जाय ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;एक जिनक भृकुटि विलास पर&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;सकल श्रृष्टि प्रलय मचि जाय&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;से ब्रज गोपी लै कानथि निरुपाय!&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;हे ऊधो, ब्रज नहिं बिसरल जाय ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;कहथि दिवाकर लीला माधव&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;केकरो सं नहिं बूझल जाय&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;ब्रज नहिं बिसरल जाय&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;हे ऊधो, ब्रज नहिं बिसरल जाय ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;img src=&#34;https://saptrashmi.kapilkanan.org/images/uploads/krishna_in_braj.jpg&#34; alt=&#34;krishna_in_braj&#34; title=&#34;krishna_in_braj&#34; /&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;small&gt;चित्र साभार - इस्कॉन&lt;/small&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;/center&gt;&lt;/p&gt;
</description>
      
    </item>
    
    <item>
      <title>नारायणी निर्मल सुभाषिनि</title>
      <link>https://saptrashmi.kapilkanan.org/2021/02/narayani-nirmal-subhashini/</link>
      <pubDate>Wed, 03 Feb 2021 14:10:54 +0000</pubDate>
      
      <guid>https://saptrashmi.kapilkanan.org/2021/02/narayani-nirmal-subhashini/</guid>
      
        <description>&lt;p&gt;&lt;center&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;img src=&#34;https://saptrashmi.kapilkanan.org/images/uploads/goddess_maheshwari.png&#34; alt=&#34;devi_maa&#34; title=&#34;devi_maa&#34; /&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;small&gt;भगवती माता  ( चित्र साभार - विकिपीडिया )&lt;/small&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;कृष्ण प्रिया तू रास विलासिनी ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;जनजन भासिनि दिव्य प्रकाशिनि ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;हरिप्रिया तू श्रृष्टि विलासिनि ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;सिंधु सुता कमलासन वासिनि ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;शिव भामिनी शक्ति स्वामिनि ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;महागौरी तू ताण्डवलासिनि ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;माता तू सब रूप में भासिनि ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;रामवल्लभा सीता सुवासिनि ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;विद्या-दात्रि मुक्ति प्रदायिनि ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;वाग्-देवी प्रबुद्ध प्रभासिनि ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;दुर्गा रूपा दुर्गति नाशिनि ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;काली रूपा पाप विनाशिनि ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;जय अम्बे अमृत उद्भासिनि ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;प्रणतारत है दीन दिवाकर ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;नारायणी निर्मल सुभाषिनि ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;/center&gt;&lt;/p&gt;
</description>
      
    </item>
    
    <item>
      <title>श्याम मेरो आस है, श्याम विश्वास है</title>
      <link>https://saptrashmi.kapilkanan.org/2021/01/shyam-mero-aas-hai-shyam-vishvash-hai/</link>
      <pubDate>Mon, 18 Jan 2021 12:57:56 +0000</pubDate>
      
      <guid>https://saptrashmi.kapilkanan.org/2021/01/shyam-mero-aas-hai-shyam-vishvash-hai/</guid>
      
        <description>&lt;p&gt;&lt;center&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;img src=&#34;https://saptrashmi.kapilkanan.org/images/uploads/shree_shyam_gitapress.jpg&#34; alt=&#34;bhagwan-sri-krishna&#34; title=&#34;bhagwan-sri-krishna&#34; /&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;small&gt; भगवन श्री कृष्ण ( चित्र साभार - गीता प्रेस ) &lt;/small&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;श्याम मेरो आस है ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;श्याम विश्वास है ।।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;मेरो गति मेरो मति ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;मेरो हर श्वास है ।।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;प्राण में है ज्ञान में है ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;उर में निवास है ।।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;सर्वत्र वोहि छायो हैं ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;कणकण सुवास है ।।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;रोम रोम व्रह्माण्ड धारी ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;शशि-चन्द्र दास है ।।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;वोहि सगुन वोहि निरगुन ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;निरंजन प्रकाश है ।।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;सुरसरि जिन्ह चरनन सौं निकसी ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;धन्य भू आकाश हैं  ।।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;नारदादि सनकादि संत ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;सतत सद् भास हैं ।।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;नूतन नित नित चिरंतन ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;प्रभु का विलास है ।।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;शरणागत है दास दिवाकर ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;जिनके न दूजै आस हैं ।।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;center&gt;&lt;/p&gt;
</description>
      
    </item>
    
    <item>
      <title>॥ श्री हरि सुमर श्री हरि सुमर ॥</title>
      <link>https://saptrashmi.kapilkanan.org/2020/11/sri-hari-sumar-sri-hari-sumar/</link>
      <pubDate>Mon, 16 Nov 2020 05:18:24 +0000</pubDate>
      
      <guid>https://saptrashmi.kapilkanan.org/2020/11/sri-hari-sumar-sri-hari-sumar/</guid>
      
        <description>&lt;p&gt;&lt;center&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;img src=&#34;https://saptrashmi.kapilkanan.org/images/uploads/vishnu_surrounded_by_his_avatars.jpg&#34; alt=&#34;Vishnu_Surrounded_by_his_Avatars&#34; title=&#34;Vishnu_Surrounded_by_his_Avatars&#34; /&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;small&gt;&amp;ldquo;भगवन नारायण और उनके 10 अवतार&amp;rdquo; - चित्र साभार - &amp;ldquo;विकिपीडिया&amp;rdquo;&lt;/small&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;मन धीर धर मन ध्यान कर&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;नाम सुधा का पान कर ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;भटका न मन को दर - ब - दर&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;श्री हरि सुमर श्री हरि सुमर ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;व्यर्थ भव भय त्याग कर&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;ज्ञान भक्ति संवार कर ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;हरिपद शरण का वरण कर&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;श्री हरि सुमर श्री हरि सुमर ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;यह भव भंवर है अति प्रबल&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;इक नाम मात्र ही है संबल ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;सभी दुश्चिंतायें त्याग कर&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;श्री हरि सुमर श्री हरि सुमर ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;आकर्षणों से मन विलग कर&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;परम दिव्यानंद वरण कर ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;अशरण शरण का भाव भर&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;श्री हरि सुमर श्री हरि सुमर ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;हरि स्वरूप को मनो भूमि पर&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;प्रतिपल तू प्रतिरोपित कर ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;श्री चरणों में अहं - शीश धर&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;श्री हरि सुमर श्री हरि सुमर ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;/center&gt;&lt;/p&gt;
</description>
      
    </item>
    
    <item>
      <title>आत्म-ज्योति जाग्रत राखू </title>
      <link>https://saptrashmi.kapilkanan.org/2020/11/aatm-jyoti-jagrat-raakhu/</link>
      <pubDate>Thu, 05 Nov 2020 14:27:06 +0000</pubDate>
      
      <guid>https://saptrashmi.kapilkanan.org/2020/11/aatm-jyoti-jagrat-raakhu/</guid>
      
        <description>&lt;p&gt;&lt;center&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;img src=&#34;https://saptrashmi.kapilkanan.org/images/uploads/hand_out_from_ocean.jpg&#34; alt=&#34;mans-hand-out-from-ocean-lighting&#34; title=&#34;mans-hand-out-from-ocean-lighting&#34; /&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;small&gt;चित्र साभार “अनस्प्लैश”&lt;/small&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;भव -कूप के घोर निशा में&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;आत्म-ज्योति जाग्रत राखू ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;गुरु प्रवर के दिव्य वचन&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;हृदय मध्य  प्रज्ज्वल राखू ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;जीवात्मा केर शाश्वत स्वरूपक&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;सुमिरण चिर संबल राखू  ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;मन बुद्धि चित्त अहंकार के&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;आत्म लीन  सदिखन राखू ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;बहिर्गत भेल इन्द्रियगण  कें&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;आत्म सुख सं संयत राखू ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;आत्म भाव के परमात्म भाव&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;सं संम्पृक्त आ समुन्नत राखू ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;गुरु वर के उपरोक्त वचन के&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;नित आचरित - यथावत् राखू ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;भव -कूप के घोर निशा में&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;आत्म-ज्योति जाग्रत राखू ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;/center&gt;&lt;/p&gt;
</description>
      
    </item>
    
    <item>
      <title>माधव के चरणाश्रय नहिं जाय</title>
      <link>https://saptrashmi.kapilkanan.org/2020/11/maadhav-ke-charanaashray-nahin-jaay/</link>
      <pubDate>Thu, 05 Nov 2020 04:06:02 +0000</pubDate>
      
      <guid>https://saptrashmi.kapilkanan.org/2020/11/maadhav-ke-charanaashray-nahin-jaay/</guid>
      
        <description>&lt;p&gt;&lt;center&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;img src=&#34;https://saptrashmi.kapilkanan.org/images/uploads/lord-krishna-white-statue.jpg&#34; alt=&#34;lord-krishna-white-statue&#34; title=&#34;lord-krishna-white-statue&#34; /&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;small&gt;चित्र साभार &amp;ldquo;अनस्प्लैश&amp;rdquo; &lt;/small&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;थिर नहि रहय चंचल  मन&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;माधव करू उपाय ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;भव भंवर में डूबि रहल ई&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;जीव कतेक असहाय ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;सभ किछु जनितहुं मृगतृष्णा में&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;मरु-थल दौगल जाय ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;विषय भोग के विषम जाल में&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;छटपट करैछ निरुपाय ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;कखनहुं नहिं ई तृप्त हुयअ मन&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;जनम जनम भटकाय ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;माधव अहींक नाम एक आश्रय&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;बुझितहुं ई भरमाय ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;हे नाथ कोना बांचब एहि फंद सं&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;कोनो बाट ने सूझाय ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;त्राहि त्राहि कय रहल दिवाकर&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;एहन जीवन नहिं जीयल जाय ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;हे मुकुन्द माधव मोहन मुरारी&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;एहि पापी के अहीं टा उद्धारी ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;बहुत नाच नचओलक ई मन&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;माधव के चरणाश्रय नहिं जाय ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;/center&gt;&lt;/p&gt;
</description>
      
    </item>
    
    <item>
      <title>कहो काल ने क्या नहीं लीला है ?</title>
      <link>https://saptrashmi.kapilkanan.org/2020/10/kaho-kaal-ne-kya-nahin-leela-hai/</link>
      <pubDate>Fri, 16 Oct 2020 12:04:37 +0000</pubDate>
      
      <guid>https://saptrashmi.kapilkanan.org/2020/10/kaho-kaal-ne-kya-nahin-leela-hai/</guid>
      
        <description>&lt;p&gt;&lt;center&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;img src=&#34;https://saptrashmi.kapilkanan.org/images/uploads/girl_sitting_on_bench_thinking.jpg&#34; alt=&#34;girl sitting and thinking&#34; title=&#34;girl sitting and thinking&#34; /&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;small&gt;चित्र साभार - &amp;ldquo;अनस्प्लैश&amp;rdquo;&lt;/small&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;विस्मृति और सम्मोह से ग्रस्त हैं हम&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;नाहक नासमझी से त्रस्त हैं हम&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;बेकार की बातों में व्यस्त हैं हम&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;हरि स्मरण के चिर सुख में क्यों नहीं न्यस्त हैं हम ?&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;एक बार समझ चुके वही नियन्ता है&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;कि हर सांस उसी से चलता है&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;मन ! फिर क्यूँ तू भटकता है ?&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;व्यर्थ दुःख ही पाता है ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;नियत हर काल हर गति&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;हर चक्र है&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;बस स्थिर नहीं तुम्हारा मन&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;जो कुटिल अति वक्र है ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;यह संसार महज प्रवास है&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;प्रभु धाम स्थाई आवास है&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;अन्य किसका भरोसा&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;किसकी आस है ?&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;विषय-रंजन में  जो आनंद हम पाते&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;उनकी क्षणभंगुरता से अंत हम पछताते&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;सभी अंतरंगता प्रियता खो जाते&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;हाय ! काल में क्या न देखा समाते ?&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;स्थान काल और पात्र की जग क्रीड़ा है&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;विषम होने पर बस पीडा ही पीड़ा है&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;अनुनय अनुबंध महज एक भ्रम है&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;कहो काल ने क्या नहीं लीला है ?&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;img src=&#34;https://saptrashmi.kapilkanan.org/images/uploads/candles_in_lake.jpg&#34; alt=&#34;candles in lake&#34; title=&#34;candles in lake&#34; /&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;small&gt;चित्र साभार - &amp;ldquo;अनस्प्लैश&amp;rdquo;&lt;/small&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;/center&gt;&lt;/p&gt;
</description>
      
    </item>
    
    <item>
      <title>आरति करू गुरुदेव गुणी की </title>
      <link>https://saptrashmi.kapilkanan.org/2020/10/aarati-karu-gurudev-guni-ki/</link>
      <pubDate>Thu, 15 Oct 2020 11:57:06 +0000</pubDate>
      
      <guid>https://saptrashmi.kapilkanan.org/2020/10/aarati-karu-gurudev-guni-ki/</guid>
      
        <description>&lt;p&gt;&lt;center&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;img src=&#34;https://saptrashmi.kapilkanan.org/images/uploads/sri_gurudev_sitting_1.jpeg&#34; alt=&#34;Yogarsh Siri Kapil Sri Gurudev    &#34; title=&#34;Yogarsh Siri Kapil Sri Gurudev &#34; /&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;आरति करू गुरुदेव गुणी की&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;ब्रह्म तत्व आध्यात्म मुनी की ।।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;सुख बरसावथि हिय हरसावथि&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;शिष्य जनक सन्मार्ग देखावथि ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;परम दिव्य परमार्थ प्रणी की&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;आरति करू ~  ब्रह्म तत्व ~ ।।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;मिथला मध्य शुभ अवतारल&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;ईश भक्ति जनजन में  पसारल ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;साधु समर्थ सद् ज्ञान सुधी की&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;आरति करू ~  ब्रह्म तत्व ~ ।।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;योग सांख्य संदेश संवाहक&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;भव -मुक्ति जीवन उद्धारक ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;आत्म-ज्ञान सद्-ज्ञान धनी की&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;आरति करू ~  ब्रह्म तत्व ~ ।।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;ज्ञान प्रदाता अज्ञानी जन के&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;भक्ति प्रदाता पापी मन के ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;धर्म मार्ग सद् सत्य ध्वजी की&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;आरति करू ~  ब्रह्म तत्व ~ ।।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;विपिन, विवेक, भोला ब्रह्म चारी&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;अमित, हिमाद्रि, किरण सद्-चारी ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;गावथि आरति गुरुवर अग्रणी की&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;आरति करू ~  ब्रह्म तत्व ~ ।।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;सत्य नारायण, निर्मल मारवाडी&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;बिपिन, धर्मेन्द्र सभ व्यापारी ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;करथि निशि वन्दन गुरु मणि की&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;आरति करू ~  ब्रह्म तत्व ~ ।।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;आदित्य, नवल, दिनेश पाठक जी&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;पूजथि निश पूज्य-पद गुरुवरश्री ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;परम प्रकाश प्रिय हित सब ही की&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;आरति करू ~  ब्रह्म तत्व ~ ।।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;मनुराज, सन शिष्य गुण गावय&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;प्रति दिन भाव पुष्प चढाबय ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;सकल शिष्य के प्राण प्रणी की&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;आरति करू ~  ब्रह्म तत्व ~ ।।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;आरति करू गुरुदेव गुणी की&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;ब्रह्म तत्व आध्यात्म मुनी की  ।।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;img src=&#34;https://saptrashmi.kapilkanan.org/images/uploads/samadhi-sthal-1.jpg&#34; alt=&#34;योगर्षि श्री कपिल समाधि स्थल &#34; title=&#34;योगर्षि श्री कपिल समाधि स्थल &#34; /&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;/center&gt;&lt;/p&gt;
</description>
      
    </item>
    
    <item>
      <title>भव हरि शरणं, भव हरि शरणं </title>
      <link>https://saptrashmi.kapilkanan.org/2020/10/bhav-hari-sharanam-bhav-hari-sharanam/</link>
      <pubDate>Thu, 15 Oct 2020 05:43:01 +0000</pubDate>
      
      <guid>https://saptrashmi.kapilkanan.org/2020/10/bhav-hari-sharanam-bhav-hari-sharanam/</guid>
      
        <description>&lt;p&gt;&lt;center&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;img src=&#34;https://saptrashmi.kapilkanan.org/images/uploads/dhruvjee_aur_bhagwan_narayan.png&#34; alt=&#34;dhruvjee_and_bhagwan_narayan&#34; title=&#34;dhruvjee_and_bhagwan_narayan&#34; /&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;small&gt;ध्रुव जी और भगवन नारायण ( चित्र  साभार - गीता प्रेस )&lt;/small&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;त्यज प्रपंचं मिथ्याचारं&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;भव हरि शरणं, भव हरि शरणं  ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;त्वां गतिं न मतिं अन्यत्रं&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;भव हरि शरणं भव हरि शरणं ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;कलि-मल हरणं भव सिन्धु तरणं&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;हरि स्मरणं सर्वथा करणं ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;हरिपद वरणं परम सुकरणं&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;भव हरि शरणं, भव हरि शरणं ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;मिथ्या वेषं दुःख अशेषं&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;सकल प्रदेशं दुर्निवेशं ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;कुत्र अन्यत्र परम निवेशं&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;भव हरि शरणं, भव हरि शरणं ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;हरि कीर्तनं ब्रह्मानंदं&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;अमित शाश्वतं परमानंदं ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;सुखं सौख्यकरं शुभाचरणं&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;भव हरि शरणं, भव हरि शरणं ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;br&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;गहनं माया लोक दुस्तरं&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;पुनरागमनं नास्ति अभीष्टं ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;सदानुरागं कुरु भजनं रमणं&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;भव हरि शरणं, भव हरि शरणं ॥&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;/center&gt;&lt;/p&gt;
</description>
      
    </item>
    
    <item>
      <title>तेरी हर बात प्यारी थी</title>
      <link>https://saptrashmi.kapilkanan.org/2020/10/teri-har-baat-pyaari-thi/</link>
      <pubDate>Wed, 14 Oct 2020 15:58:56 +0000</pubDate>
      
      <guid>https://saptrashmi.kapilkanan.org/2020/10/teri-har-baat-pyaari-thi/</guid>
      
        <description>&lt;p&gt;&lt;center&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;img src=&#34;https://saptrashmi.kapilkanan.org/images/uploads/sri_gurudev_sitting_1.jpeg&#34; alt=&#34;योगर्षि श्री कपिल&#34; title=&#34;योगर्षि श्री कपिल&#34; /&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;तेरी हर बात प्यारी थी&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;इस जग से ही न्यारी थी&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;तेरे सोहबत में बिताए जो लम्हे हमने&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;तमाम उम्र के खुशियों पे भारी थी&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;तू जान थे अरमान थे&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;शागिर्दों  के दोंनो जहान थे&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;सिफर तेरे जाने से पैदा होगा इतना बडा&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;शिद्दते-गम के इस अहसास से हम वाकिफ़ न थे&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;मसीहा तू हरदिल अजीज हर आंखो का नूर था&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;मुकद्दस मशविरा तेरा जमाने में बड़ा मशहूर था&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;संजोए मन में तेरी हर बात, हर संदेश को&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;रखना होगा बेशकीमती हीरों की तरह&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;अहमियत जिसकी है आज भी, रहेगी कल भी&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;उसके साथ में  जो हम सबों को मंजूर था&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;/center&gt;&lt;/p&gt;
</description>
      
    </item>
    
    <item>
      <title>आश्रम निर्माण रूपी महायज्ञ में अपनी आहुति दें</title>
      <link>https://saptrashmi.kapilkanan.org/2020/09/ashram-nirman-rupi-mahayagyn-me-apani-ahuti-den/</link>
      <pubDate>Wed, 09 Sep 2020 06:13:34 +0000</pubDate>
      
      <guid>https://saptrashmi.kapilkanan.org/2020/09/ashram-nirman-rupi-mahayagyn-me-apani-ahuti-den/</guid>
      
        <description>&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;center&gt;!! ॐ श्री गुरुवे नमः !!&lt;/center&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;आज दिनांक 8 सितम्बर 2020, श्री गुरुदेव के वाग्लोक गमनोपरांत तीसरा छाया कर्म निमित्त तर्पण, ब्राह्मण भोजन एवं भजन - संकीर्तन का आयोजन नवनिर्माणधीन आश्रम, मधेपुर में किया गया ।&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;img src=&#34;https://saptrashmi.kapilkanan.org/images/uploads/madhepur-tarpan-bhoj-9sep-1.jpg&#34; alt=&#34;श्री गुरुदेव के वाग्लोक गमनोपरांत तीसरा छाया कर्म निमित्त तर्पण&#34; title=&#34;श्री गुरुदेव के वाग्लोक गमनोपरांत तीसरा छाया कर्म निमित्त तर्पण&#34; /&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;मधेपुर में हम भवनहीन न रहें इसके लिए जुलाई माह 2020 से &lt;strong&gt;“आश्रम निर्माण कोष”&lt;/strong&gt; का गठन कर दिया गया है, जिसके अंतर्गत कुछ श्रद्धालु प्रत्येक महीना अपना श्रद्धा सुमन अर्पित कर रहे है और आज बहुत सारे शिष्य-शिष्याओं ने भी इस महान लक्ष्य को प्राप्त करने और आश्रम निर्माण के कार्यक्रम को गति देने के लिए स्वेक्षापूर्वक हाथ बढ़ाये है, &lt;strong&gt;श्रीकपिल कानन कार्यकारिणी समिति&lt;/strong&gt; आपके इस अनुपम प्रयास का हृदय से स्वागत करती है ।&lt;/p&gt;


&lt;div style=&#34;position: relative; padding-bottom: 56.25%; height: 0; overflow: hidden;&#34;&gt;
  &lt;iframe src=&#34;//www.youtube.com/embed/IhMR78IvJsE&#34; style=&#34;position: absolute; top: 0; left: 0; width: 100%; height: 100%; border:0;&#34; allowfullscreen title=&#34;YouTube Video&#34;&gt;&lt;/iframe&gt;
&lt;/div&gt;


&lt;blockquote&gt;
&lt;p&gt;आश्रम का निर्माण न तो किसी व्यक्ति विशेष से होता है और न ही व्यक्ति विशेष के द्वारा सफलतापूर्वक संचालित किया जाता है । यह आश्रम वर्षों, दशकों एवं शताब्दियों तक ही सीमित नहीं रहनेवाला अपितु समय धारा के साथ अनवरत चलने वाला है, और श्री गुरुदेव के दिव्य ज्ञान का वितरण संसार में करने वाला है । आश्रम का निर्माण संगठन से ही होता है ।&lt;/p&gt;
&lt;/blockquote&gt;

&lt;p&gt;और आज मधेपुर आश्रम का निर्माण स्थूल रूप से शुरुआत होने के कगार पर है, परंतु हम सभी ने पहले ही   अपने – अपने हृदय में सूक्ष्म आश्रम का निर्माण कर लिया है ।&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;img src=&#34;https://saptrashmi.kapilkanan.org/images/uploads/samadhi-sthal-1.jpg&#34; alt=&#34;श्री गुरुदेव का समाधि स्थल मधेपुर&#34; title=&#34;श्री गुरुदेव का समाधि स्थल मधेपुर&#34; /&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;इसका निर्माण सिर्फ पैसे से नहीं हो सकता, आश्रम के निर्माण में तो मानसिक, शारीरिक एवं आर्थिक त्याग की आहुति देनी होगी और श्री गुरुदेव के इस महान कार्य को आगे बढ़ाने में हम सभी शिष्यगण को निमित्त बनना होगा, और यह हमारे लिए बहुत ही हर्ष का विषय है ।&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;जो भी शिष्यगण किसी भी कारणवश अभी तक आगे नहीं आ पाए हैं , उनसे भी आग्रह है कि आप आगे आएं एवं इस आश्रम निर्माण रूपी महायज्ञ में अपनी आहुति प्रदान करें ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;center&gt;!! जय गुरुदेव !!&lt;/center&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
</description>
      
    </item>
    
    <item>
      <title>Someone is unhappy.. Let them be..</title>
      <link>https://saptrashmi.kapilkanan.org/2020/09/some-one-is-unhappy-let-them-be/</link>
      <pubDate>Tue, 01 Sep 2020 09:20:03 +0000</pubDate>
      
      <guid>https://saptrashmi.kapilkanan.org/2020/09/some-one-is-unhappy-let-them-be/</guid>
      
        <description>&lt;p&gt;&lt;img src=&#34;https://saptrashmi.kapilkanan.org/images/uploads/happy-and-carefree-baby.jpg&#34; alt=&#34;happy and carefree baby&#34; title=&#34;happy and carefree baby&#34; /&gt;&lt;/p&gt;

&lt;blockquote&gt;
&lt;p&gt;Someone is unhappy..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;Let them be..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;Someone is judging you..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;Let them judge..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;Someone thinks you are wrong..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;Let them think..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;Someone has problem with your deeds..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;Let them have..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;Someone is demotivating you..&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;Let them be demotivated themselves..&lt;/p&gt;
&lt;/blockquote&gt;

&lt;p&gt;&lt;img src=&#34;https://saptrashmi.kapilkanan.org/images/uploads/man-sitting-calm-beside-lake_small.jpg&#34; alt=&#34;a soul seeker&#34; title=&#34;A Soul Seeker&#34; /&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;All they have is unhappiness, inappropriate sense of judgement, wrong thinking &amp;amp; they themselves do nothing, so they are angry. They think you are breaking the bounds, &lt;strong&gt;in a nutshell they want you to satisfy their ego, which you don’t.&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;People like these, are often living with their own greater pseudo self and ego, which lead them to darkness.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;Suppose, you decided to work for some great cause, they may express their unhappiness in several ways, in their pseudo, small &amp;amp; narrow thought they think, you are invading their territory. And you may feel their anger in different ways.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;Actually, these obstacles are often felt by spiritual people. &lt;strong&gt;Our spiritual master &amp;ldquo;Yogarshi Sri Kapil&amp;rdquo; has already wrote and indicated about these things.&lt;/strong&gt; These “Tamasik” or “Aasuri” “vritti” are propagated by the world of darkness upon these types of people, who are the right absorber of “Tamasik” “Vritti” to create difficulties in your divine path, after they themselves are constantly trying &amp;amp; failing in it.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;You should carefully avoid them, their unhappiness, their anger, everything related with them and concentrate on your journey, your goal.&lt;/p&gt;

&lt;blockquote&gt;
&lt;p&gt;In a long journey to find yourself, you may encounter many helping hands too. They will help you, whenever you are tired, you are demotivated, when you start to think that your goal is actually unreachable.&lt;/p&gt;
&lt;/blockquote&gt;

&lt;p&gt;&lt;img src=&#34;https://saptrashmi.kapilkanan.org/images/uploads/holding-baby-hand-samall.jpg&#34; alt=&#34;helping hands&#34; title=&#34;helping hands&#34; /&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;These helping hands are of course from the world of light. Sometimes these helps may be from some actual people in this world. These ingenious and “Satvaguni” people are the perfect instrument to spread kindness, help, divinity, by those helping hands of light from subtle world.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;Be respectful to these helping hands, but a truth seeker should move beyond these things. If light is guiding you, be respectful &lt;strong&gt;but don’t stop your journey there, thinking this is your final destination.&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;In the same way if darkness is creating troubles for you, don’t be afraid, always remember &lt;strong&gt;you have no other choice once you start.&lt;/strong&gt; You have to face them, and make sure you always outperform them with your tools. &lt;strong&gt;This is true and leads to success.&lt;/strong&gt;  Here your tool may be different and according to the choice of your “Darshana” and method of attaining enlightenment.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;img src=&#34;https://saptrashmi.kapilkanan.org/images/uploads/woman-sitting-in-desert-small.jpg&#34; alt=&#34;surrounded with the physical and subtle army of darkness&#34; title=&#34;surrounded with the physical and subtle army of darkness&#34; /&gt;&lt;/p&gt;

&lt;blockquote&gt;
&lt;p&gt;When you are in trouble, &lt;strong&gt;surrounded with the physical and subtle army of darkness, remember the divine will of enlightenment is calling you and you are making progress very fast,&lt;/strong&gt; hence the world of darkness has started to interfere here. &lt;strong&gt;They themselves are afraid of you, once you reach your destination it will be impossible for them to harm you or mislead you.&lt;/strong&gt; &lt;strong&gt;Also, the divine power of your spiritual master is with you &amp;amp; waiting for your moves,&lt;/strong&gt; she is clearing your path, removing unnecessary and unwanted things and making it clearer.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;Who is your God, till you reach your goal?
The answer is – “Your own will power”.&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;And how to increase it?&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;“Just be on the side of it at any cost.”&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;/blockquote&gt;

&lt;p&gt;Then it will become omnipotent by merging it with the will power of your spiritual master and leads you to your destination.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;It will destroy everything but will lead you to your divine self “Aatman”.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;img src=&#34;https://saptrashmi.kapilkanan.org/images/uploads/meditating-on-hill-top.jpg&#34; alt=&#34;meditaing woman for aatman&#34; title=&#34;meditaing woman for aatman&#34; /&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;The omnipresent and omnipotant “Aatman” has it’s divine ego. &lt;strong&gt;Don’t stop there by enjoying the bliss and destroy it’s ego as well, leave your path, your “darshan”, your philosophy there, &amp;amp; there is absolute nothing, neither light nor darkness. Sri Gurudev (Our spiritual master) indicated about this in “Vaartaa”, Vol -1.&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;blockquote&gt;
&lt;p&gt;&lt;strong&gt;But to attain this goal easily, bow to your spiritual master, your Guru, he is the one who is already in this state and if he decides to enlighten you, nothing can stop you.&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;/blockquote&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;Yes, it’s true some people say that there is no need of “Spiritual Master” and you can attain it by yourself alone. They are true, but makes it almost impossible.
 Even Lord Krishna directs Arjuna to seek for a learned Guru in Geeta.&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;blockquote&gt;
&lt;p&gt;So, you will experience both if you are a soul seeker, if you started your journey to find divine self.&lt;/p&gt;
&lt;/blockquote&gt;

&lt;p&gt;Never ever care about those puppets of darkness in your life, &lt;strong&gt;because life and the storage space of your memory is precious enough.&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
</description>
      
    </item>
    
    <item>
      <title>श्री गुरुदेव के ज्ञान यज्ञ में आपकी आहुति</title>
      <link>https://saptrashmi.kapilkanan.org/2020/08/sri-gurudev-ke-gyan-yagyn-me-aapkii-aahuti/</link>
      <pubDate>Thu, 27 Aug 2020 14:28:02 +0000</pubDate>
      
      <guid>https://saptrashmi.kapilkanan.org/2020/08/sri-gurudev-ke-gyan-yagyn-me-aapkii-aahuti/</guid>
      
        <description>&lt;p&gt;एक यज्ञ जिस से हम में से अधिकतर लोग पूर्व परिचित हैं, और जिसमें हम हवन सामग्री की आहुति, अग्नि में प्रदान कर देवताओं को तुष्ट करतें हैं, उनका यजन करतें हैं &lt;strong&gt;परंतु उसके अलावा भी एक महायज्ञ है जो श्री गुरुदेव के द्वारा शुरू किया गया&lt;/strong&gt; और वो अपने पार्थिव शरीर के जीर्ण होने पर भी, अपने अंतिम समय तक उसे निरंतर करते रहे, जिस से  आप में से बहुत सारे शिष्य परिचित ही होंगे, वो है – &lt;strong&gt;“ज्ञान यज्ञ”&lt;/strong&gt; .&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;जी हाँ, उन्होंने अपने अंतिम समय तक, चिकित्सालय में भी अपने इस महायज्ञ का संचालन जारी ही रखा . उन्होंने &lt;strong&gt;“गीता के दो शब्द”&lt;/strong&gt; पुस्तक की रचना ऐसे ही विषम परिस्थिति में की.
श्री गुरुदेव ने जो ज्ञान यज्ञ शुरू किया है, वो उनके वग्लोक गमनोपरांत भी पूर्ववत, अनवरत चलता रहे ऐसा हम सभी लोगों को जो श्री गुरुदेव के शिष्य हैं अथवा उनकी शिक्षा पर श्रद्धा रखतें हैं को सुनिश्चित करना चाहिए .&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;श्री गुरुदेव के शिक्षा को जन - जन तक पहुँचना भी &lt;strong&gt;“श्री गुरुदेव का कार्य”&lt;/strong&gt; करना है . जो श्री गुरुदेव के शिक्षा पर श्रद्धा रखने वाले लोग हैं, शिष्यगण हैं, तात्कालिक रुप से वही इस कार्य को करेंगें, और आने वाली पीढ़ी एवं संसार के अन्य लोग बाद में इस कार्य को करेंगे . &lt;strong&gt;श्री गुरुदेव ने अपना अमूल्य और तपः प्राप्त परम ज्ञान हमारे बीच उतारा है, जो समस्त जगत के लिए है , परंतु हम इसको प्रथम प्राप्त करने वालों में से एक हैं, इसीलिए हमारा दायित्व है की हम इसे अन्य सुधि जनों तक पहुँचाने में मदद करें .&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;हम सभी सौभाग्यशाली हैं की –&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;ul&gt;
&lt;li&gt;&lt;strong&gt;हम श्री गुरुदेव के समकालीन हैं .&lt;/strong&gt;&lt;/li&gt;
&lt;li&gt;&lt;strong&gt;आने वाली पीढियां श्री गुरुदेव के साथ – साथ हमें भी याद रखेंगी .&lt;/strong&gt;&lt;/li&gt;
&lt;li&gt;&lt;strong&gt;हमें इस पावन ऋषि कार्य को करने का सौभाग्य प्राप्त है .&lt;/strong&gt;&lt;/li&gt;
&lt;/ul&gt;

&lt;p&gt;प्रकाशित पुस्तकों का प्रसार हो, इसके  अलावा हम &lt;strong&gt;इन्टरनेट की सहायता&lt;/strong&gt; से इस कार्य को कर सकतें हैं और आज के दौर में हमें इस कार्य को करने के लिए विशेष उद्यम की आवश्यकत्ता नहीं . इन्टरनेट और अन्य साधनों की सहायता से इस कार्य को वर्तमान में आश्रम के द्वारा किया जा रहा है .&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;परंतु सोशल मिडिया या अन्य वेब प्लेटफॉर्म्स पर डाली गई सामग्री तभी तक सुगम रूप से प्रसारित नहीं हो पाती है, जब तक अनेक लोग उस पर प्रतिक्रिया न दें . इसी जगह पर आपका सहयोग वांछनीय है, तो सरल शब्दों में –&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;“आपको करना ये है की आश्रम के सोशल मिडिया एकाउंट्स पर प्रतिदिन 5 मिनट का समय देकर, डाले गए पोस्ट, फोटो, वीडियो एवं अन्य संदेशों को लाइक, कमेंट, शेयर करना है और साथ ही अगर आपने अभी तक आश्रम के  सोशल एकाउंट्स को फॉलो या सब्सक्राइब नहीं किया है तो वो भी कर लेना है” .&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;जब सोशल मिडिया यथा फेसबुक और ट्विटर पर आप किसी पोस्ट को लाइक, शेयर, कमेंट करतें हैं तो &lt;strong&gt;अल्गोरिथम&lt;/strong&gt; के हिसाब से उसकी &lt;strong&gt;रैंकिंग बेहतर सामग्री में की जाती है&lt;/strong&gt;, और उसकी &lt;strong&gt;विजिब्लिटी&lt;/strong&gt; बढ़ जाती है, और उसे अन्य लोगों की न्यूज फीड में भी दिखाया जाता है .&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;अतः आपके इस प्रकार प्रतिक्रिया देने पर आप श्री गुरुदेव के लेखनी को अन्य जनों तक पहुँचाने के पावन ऋषि कार्य में सहभागी हो जातें हैं एवं &lt;strong&gt;खुद भी लाभान्वित होतें हैं&lt;/strong&gt; .&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;आश्रम के निम्न सोशल मिडिया एकाउंट्स हैं –&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;ul&gt;
&lt;li&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;Whatsapp  ग्रुप&lt;/strong&gt; – इसमें आने वाले श्री गुरुदेव के सूक्ति या अन्य शिक्षण सामग्री को कम से कम अन्य 5 लोगों / ग्रुप तक प्रेषित करें .&lt;/p&gt;&lt;/li&gt;

&lt;li&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;फेसबुक पेज –&lt;/strong&gt;
(लिंक  &lt;a href=&#34;https://www.facebook.com/SriKapilKanan&#34;&gt;https://www.facebook.com/SriKapilKanan&lt;/a&gt; )
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&lt;li&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;इन्स्टाग्राम  –&lt;/strong&gt;
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&lt;li&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;Youtube –&lt;/strong&gt;
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आपमें से सभी के फ़ोन पर youtube एप्प होगा . तो आश्रम के इस youtube चैनल को सब्सक्राइब करें और साथ में बेल आइकॉन को दबा कर सभी नोटिफिकेशन को सेलेक्ट कर लें, इस से आने वाली वीडियोस की सूचना मिल जाएगी . और वीडियो देखें, साथ में लाइक, शेयर और कमेंट जरुर करें . सिर्फ 5 लोगों को शेयर करें तो आप समझें की ज्ञान सुधा के प्रसार में आप ने बहुत बड़ा योगदान दिया.&lt;/p&gt;&lt;/li&gt;
&lt;/ul&gt;

&lt;p&gt;अतः मैं श्री गुरुदेव के इस महान ज्ञान यज्ञ में अपनी – अपनी आहुति देने, सहयोग करने हेतु आप सभी पाठकों से निवेदन करता हूँ, &lt;strong&gt;आप सभी का आवाहन करता हूँ .&lt;/strong&gt; &lt;strong&gt;यह सहयोग स्वैछिक है&lt;/strong&gt; . इस में, दिन भर में आपके समय का सिर्फ &lt;strong&gt;5 ~ 10 मिनट लगेगा&lt;/strong&gt; और आप अपनी ज्ञान पिपासा को तृप्त करते हुए औरों की क्षुधा की पूर्ति करेंगे, और अत्यंत पावन ऋषि कार्य में सहभागी होंगे .&lt;/p&gt;
</description>
      
    </item>
    
    <item>
      <title>अर्वाचीन संत साहित्य में योगर्षि श्रीकपिल का अवदान</title>
      <link>https://saptrashmi.kapilkanan.org/2020/05/arvachin_santa_sahitya_me_yogarshi_sri_kapil_ka_avadaan/</link>
      <pubDate>Sat, 30 May 2020 09:14:25 +0000</pubDate>
      
      <guid>https://saptrashmi.kapilkanan.org/2020/05/arvachin_santa_sahitya_me_yogarshi_sri_kapil_ka_avadaan/</guid>
      
        <description>

&lt;h3 id=&#34;व-षय-प-रस-त-वन&#34;&gt;विषय-प्रस्तावना&lt;/h3&gt;

&lt;p&gt;हिन्दी साहित्य ही नहीं अपितु विश्व की समस्त साहित्य-संपदा अपने संरक्षण-संवर्धन हेतु संतों का ऋणी रहा है। साहित्यकारों ने यदि साहित्य की काया को सजाया-सँवारा है तो संतों ने इसकी आत्मा का श्रृंगार किया है। प्रत्येक सभ्यता-संस्कृति के पोषण में, उसकी कुरीतियों के निवारण में तत्कालीन समाज के वैसे नायक-नायिकाओं का हम प्रादुर्भाव देखते हैं जो त्याग-बलिदान की उदार भावना से भरे हुए, सांसारिक मोह-माया को तुच्छ मानने वाले, विशाल व्यक्तित्व के धनी रहे हैं। जनसामान्य से हटकर उनमें जो मौलिक, चिंतन, बौद्धिक प्रखरता और अतः प्रेरणा की तीव्रता पाई जाती है वही उन्हें संत कोटि का पद प्रदान करती है। हिन्दी साहित्य का भक्तिकाल यदि कबीर, तुलसी, सूर की महान रचना से स्वर्ण-सिंहासन पर विराजमान है तो अब तक काल-प्रवाह में बहुत से संत का साहित्य किसी अज्ञात क्षेत्र में, स्थानीय स्तर पर ही चेतना क्रांति का संवाहक बना हुआ है। न तो यह समाज की आज सामाजिक-धार्मिक कुप्रथाओं, भेदभाव, छुआछूत, सांप्रदायिक वैमनस्य से मुक्त हुआ है और न ही इन पर कुठाराघात करने वाले संतों की महत्ता गौण हुई है। 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध से लेकर 20वीं शताब्दी तक हमने दयानंद सरस्वती, रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानन्द, रामतीर्थ, मुक्तानन्द, योगानन्द, श्री अरविन्द, महात्मा गांधी, रमन महर्षि, प्रभुपाद जी जैसे अनेकानेक संत विभूतियों का साक्षात्कार किया जिनकी वक्तृता, लेखनी एवं सत्संग-संस्मरण ने भारतीय संस्कृति-सभ्यता के नवोत्थान में अपना अमूल्य योगदान दिया, साथ ही विश्व के अन्य प्रांत में भी वैदिक संस्कृति का झंडा लहराया। स्वातंत्रयोत्तर भारत की ऐसी ही संत विभूतियों में से एक हैं- योगर्षि श्रीकपिल जिनके साधवोचित उत्कृष्ट व्यक्तित्व एवं विलक्षण कृतित्व से आज समस्त हिंदी जगत कृतकृत्य हो रहा है। उनकी रचना का विपुल भंडार हमें 21वीं सदी में प्राप्त हो रहा है जो अपने काव्य-सौंदर्य एवं संदेश की सार्थकता के कारण गहन शोध का विषय बना है। समकालीन आलोचकों एवं शोधार्थियों के दृष्टि-पटल से अनवलोकित ये काव्य-संपदा शोधश्री से विभूषित हो और भी अधिक जनसेवी सिद्ध होगी, इसमें संदेह नहीं है।&lt;/p&gt;

&lt;h3 id=&#34;य-गर-ष-श-र-कप-ल-व-यक-त-त-व-एव-क-त-त-व&#34;&gt;योगर्षि श्रीकपिलः व्यक्तित्व एवं कृतित्व&lt;/h3&gt;

&lt;p&gt;भारतीय साधना धारा के भिन्न-भिन्न स्थापित साधनाओं के अभ्यास में बाल्यकाल से ही सिद्धहस्त, त्याग-वैराग्य की प्रतिमूर्ति, ज्ञान-भक्ति एवं कर्म के समन्वयवादी संत योगर्षि श्रीकपिल का जन्म 11 अगस्त 1951 ई0 को हुआ। इनके पिता श्री बलबीर मिश्र मिथिला के मधेपुर ग्राम के एक प्रतिष्ठित शाकलद्वीपीय ब्राह्मण वंश  के प्रसिद्ध आयुर्वेद चिकित्सक थे। इनके पूर्वज आज से लगभग 200 वर्ष पहले दरभंगा महाराज के आमंत्रण पर मनसूरचक से आकर मिथिला में बसे थे। कृष्णकाल से ही शाकलद्वीपीय ब्राह्मण आयुर्वेद, ज्योतिष एवं सूर्यभक्ति में निष्णात माने जाते रहे हैं। श्रीकपिल भी इनके अपवाद नहीं थे। इनकी बाल्यकाल की रचना ‘श्रद्धा’ से पता चलता है कि पूर्वजन्मार्जित संस्कारवश  ये बचपन से ही भगवद्भक्ति में लीन रहते थे। इन्होंने जगत के सार तत्व का अन्वेषण कर लिया था -&lt;/p&gt;

&lt;blockquote&gt;
&lt;p&gt;या नीरस संसार में सार रस इक नाम&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;ज्ञानी खोजे प्रेम से तज औरन जग काम&lt;/p&gt;
&lt;/blockquote&gt;

&lt;p&gt;उच्च विद्यालय स्तर की कक्षा में आते-आते उन्हें गीता कण्ठस्थ हो चुकी थी और उसके सांख्य-परक श्लोकों को चिन्हित कर वे उसका अभ्यास करने लगे।&lt;/p&gt;

&lt;blockquote&gt;
&lt;p&gt;योगी हो कपाल माँहि भृकुटि मध्य परम प्रकाश निहारे हैं&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;साधन को साध-साध पद निर्वाण पाबे हैं।&lt;/p&gt;
&lt;/blockquote&gt;

&lt;p&gt;तदन्तर महाविद्यालय स्तर का अध्ययन अच्छे अंकों से उत्तीर्ण कर इन्होंने देश के प्रसिद्ध तीर्थस्थलों का भ्रमण किया। इनके डायरी के पढ़ने पर प्रकृति के सभी चित्र खींचते चले गये एवं भगवद् प्रेम की दिव्यता और अध्यात्म का एकांतिक वार्तालाप कविता के माध्यम से व्यक्त होने लगा। अनंत ज्ञान का यह जिज्ञासु पथिक आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रती होकर दिव्यता के विविध संस्पर्शों को संजोने लगा।&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;प्रमुख रचनाएँः-&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;योगर्षि श्रीकपिल की अभिव्यक्ति का मुख्य माध्यम काव्य रहा है। आध्यात्मिक तथ्य एवं अनुभूतियों के विषद-विष्लेषण हेतु उनकी कतिपय गद्य रचनाएँ भी प्रकाशित  हुई हैं। उनकी अब तक कुल 32 ग्रंथों का प्रकाशन हो चुका है जिनमें मुख्य कृतियाँ निम्नलिखित हैंः-&lt;/p&gt;

&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;अमृत पराग        5.  गुलाल           9.  प्रेत रहस्य&lt;/li&gt;
&lt;li&gt;पंखुरी के हंस        6.  शिखा            10. मृत्यु-चक्र&lt;/li&gt;
&lt;li&gt;माँझी और झील    7.   अंकुर           11. तत्व बोध&lt;/li&gt;
&lt;li&gt;अंगार का अंजन       8.   क्रीड़ा          12. कपिलोपनिषद&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;

&lt;h3 id=&#34;श-र-कप-ल-क-क-व-य-क-प-र-स-ग-कत&#34;&gt;श्रीकपिल के काव्य की प्रासंगिकता&lt;/h3&gt;

&lt;p&gt;अन्य संत-साहित्य के समान ही आजकल भी निम्न कारणों से योगर्षि कपिल की काव्य की प्रासंगकिता हैः-&lt;/p&gt;

&lt;ul&gt;
&lt;li&gt;&lt;strong&gt;(अ) जाति-पाति का विरोध/सामन्तवादी विचारधारा का विरोधः-&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;/li&gt;
&lt;/ul&gt;

&lt;p&gt;उक्त संदर्भ में यत्र-तत्र दोहा, कविता, सूक्ति भरे पड़े हैं। एक-दो    उदाहरण द्रष्टव्य हैः-&lt;/p&gt;

&lt;blockquote&gt;
&lt;p&gt;दीनबन्धु से नेह जौं क्यों दीनन ठुकराय&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;बन्धु दुखी हो देखके स्वयं आप मुरझाय&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;(श्रद्धा)&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;खोटा देख चुने नहीं खोटा यह संसार&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;अंधकार के राज्य में उद्गण खिले हजार&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;( गुलाल)&lt;/p&gt;
&lt;/blockquote&gt;

&lt;ul&gt;
&lt;li&gt;&lt;strong&gt;(ब) साम्प्रदायिक एकता के पैरोकारः-&lt;/strong&gt;&lt;/li&gt;
&lt;/ul&gt;

&lt;p&gt;आज के संदर्भ में जब समाज भिन्न - भिन्न धर्म एवं सम्प्रदाय के प्रति असहिष्णु बना है- योगर्षि का संदेश  अतिशय महत्वपूर्ण प्रतीत होता है-&lt;/p&gt;

&lt;blockquote&gt;
&lt;p&gt;एक डाल पर कई पंछी संग-संग ख़ुशी  मनाते&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;नहीं झगड़ते फूल चमन में सदा साथ मुस्काते&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;लड़ते नहीं तारे गगन में एक सोम संग गाते&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;एक हिमगिरि से कई निर्झर संग धरा पर आते&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;( पंखुरी के हंस)&lt;/p&gt;
&lt;/blockquote&gt;

&lt;ul&gt;
&lt;li&gt;&lt;strong&gt;(स) पाखण्ड, वितण्ड एवं रूढ़ियों का विरोधः-&lt;/strong&gt;&lt;/li&gt;
&lt;/ul&gt;

&lt;p&gt;उक्त संदर्भ में उनकी निम्न पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैः-&lt;/p&gt;

&lt;blockquote&gt;
&lt;p&gt;कर की घंटी टन-टन बाजे मन की घंटी नाहि&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;कपिला मन घंटी बिना हरि मिलत है नाहि&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;( पंखुरी के हंस )&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;अंदर से काला भरा बाहर चकमक छाय&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;रे मूरख ये चकमकी खाक बन उड़ जाय&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;(  गुलाल-मिथ्याचार )&lt;/p&gt;
&lt;/blockquote&gt;

&lt;ul&gt;
&lt;li&gt;(द)   &lt;strong&gt;वाह्याचार एवं अंधविश्वासों का खंडनः-&lt;/strong&gt;&lt;/li&gt;
&lt;/ul&gt;

&lt;p&gt;सत्य द्रष्टा आन्तरिक रूपान्तरण के पक्षधर होते हैं न कि वाह्याचार का, देखिए-&lt;/p&gt;

&lt;blockquote&gt;
&lt;p&gt;चंदन खाक लगाय के जट्टा लियो बढ़ाय कर कमंडल खनती धिये झोरी बगल लपटाय&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;हो बहुरूपिया बन बौराय - हो बहुरूपिया बन बौराई (पंखुरी के हंस)&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;भ्रम में भरमे मानव जग में तीर्थ तीर्थ बौराय&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;सत्य तीर्थ है क्षमा तीर्थ है अन्तर देत जगाय  ( पंखुरी के हंस)&lt;/p&gt;
&lt;/blockquote&gt;

&lt;h3 id=&#34;श-र-कप-ल-क-स-त-स-ह-त-य-क-व-श-षत&#34;&gt;श्रीकपिल के संत साहित्य की विशेषता&lt;/h3&gt;

&lt;p&gt;श्रीकपिल के समस्त साहित्य का अध्ययन करने पर हमें उनकी काव्य रचना की निम्नांकित विशेषताएं परिलक्षित होती हैं।&lt;/p&gt;

&lt;ol&gt;
&lt;li&gt;&lt;strong&gt;रहस्यवादः-&lt;/strong&gt; सृष्टि के कार्य व्यापार के पीछे क्रियाशील, इस संसार   को चलाने वाले में आस्था ही रहस्यवाद का मूल है। यह आस्था आरम्भ में विस्मय एवं जिज्ञासा भाव के रूप में सामने आती हैः-&lt;/li&gt;
&lt;/ol&gt;

&lt;blockquote&gt;
&lt;p&gt;यह अलंकृत प्रकृति-चारण किस महान का करता वंदन&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;किस राजन ने किया है धारण विश्व - सभा-कीरीट-अभिनंदन&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;(अमृत पराग)
2. &lt;strong&gt;वेदना भावः-&lt;/strong&gt; उनकी भावपरक रचना की केंद्रीय संवेदना में एक अलौकिक वेदना सर्वत्र दृष्टगत होता हैः-&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;मन नीर भरो तन पीड़ भरो&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;कैसी ऋतु आई शाम सुहावन की&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;( अमृत पराग )&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;सदियों से बरसता है सावन मरूभू कुँवारा बैठा है&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;युगों से उतरता है सूरज जंगल में अंधेरा छाया है&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;(अमृत पराग)
3. &lt;strong&gt;छायावादः-&lt;/strong&gt; योगर्षि की प्रारम्भिक रचनाएँ- ‘अमृत पराग’ एवं ‘पंखुरी के हंस’ में छायावाद शैली का स्पष्ट प्रभाव परिलक्षित होता हैः-&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;घटा की डोली में/सितारों की बारात है&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;पंखुरी के घूँघट में/भ्रमरों की शहनाई है&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;आँखों में तैरती हो/नब्जों में गुनगुनाती हो&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;सांसों में खेलती हो दिन के धड़कनों के गीत हो&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;( पंखुरी के हंस )
4. &lt;strong&gt;विवेकानन्द एवं श्री अरविन्द का प्रभावः-&lt;/strong&gt; युवा सन्यासी के प्रेरणास्त्रोत रहे स्वामी विवेकानंद के ओजस्वी विचार एवं समाजोत्थान का संकल्प योगर्षि के काव्य में सहज अनुमेय हैः-&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;उठो उठाओ अपने आपको&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;चोटी के उन तारों में&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;जहाँ से खिलता फूल चमन में&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;आता मस्त बहारों में&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;( अमृत पराग )&lt;/p&gt;
&lt;/blockquote&gt;

&lt;p&gt;श्री अरविन्द के रूपान्तरण में योगर्षि की आस्था स्पष्ट हैः-&lt;/p&gt;

&lt;blockquote&gt;
&lt;p&gt;शिक्षक तुम्हारा ऊँट क्यों न रेगिस्तान जहाज&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;इससे तू न तरोगे बिना रूपान्तरण यार&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;( गुलाल )&lt;/p&gt;
&lt;/blockquote&gt;

&lt;h3 id=&#34;श-र-कप-ल-क-क-व-य-म-न-ह-त-दर-शन&#34;&gt;श्रीकपिल के काव्य में निहित दर्शन&lt;/h3&gt;

&lt;p&gt;योगर्षि की रचनाओं में उनकी साधना के ही अनुकूल सांख्य, योग एवं वेदांत दर्शन की झलक मिलती हैः-&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;सांख्यः-&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;blockquote&gt;
&lt;p&gt;चौबीस तत्व के दो घाघबने बीबी साहब&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;इक घाघरा मिट्टी पत्थर&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;इक बात की नाव&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;( त्रिवसनी-अंगार का अंजन)&lt;/p&gt;
&lt;/blockquote&gt;

&lt;p&gt;पंचमहाभूत, पंचतन्मात्राएँ, पंचकर्मेन्द्रियाँ, पंचज्ञानेन्द्रिय सहित अन्तःकरण चतुष्टय रूपी चौबीस तत्व से बने जीवात्मा के स्थूल शरीर एवं लिंग शरीर का अस्तित्व सांख्यसम्मत है।&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;वेदांतः-&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;blockquote&gt;
&lt;p&gt;बीज अंकुर से पहले न खेत खलिहान&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;चावल गेहूँ गलने से न पहचान पकवान&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;एक पाँव में चार पाँव रहे चारों के चार देश&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;उजड़ा चमन आँधी वेग से रहे मिष्ठी चीनी वेश&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;( सुरसरि स्नान-अंगार का अंजन)&lt;/p&gt;
&lt;/blockquote&gt;

&lt;p&gt;अर्थात सृष्टि के सृजन के पूर्व एकमात्र आत्मा का ही अस्तित्व रहता है एवं सृष्टि के अंत में भी एकमात्र यही शेष बचता है।एक ही परमतत्व से चार प्रकार की सृष्टि है- आधिभौतिक, आधिदैविक, आध्यात्मिक एवं कैवल्य-जैसे एक ही चीनी से अनेकविध मिष्ठान्न बनता है। यही वेदांत दर्शन का सार है।&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;योगः-&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;blockquote&gt;
&lt;p&gt;इक पिया घर आसन बैठे करे मुहल्ला हिसाब&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;नाप जोखकर पट सिलावे खेवे सर में नाव&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;एक बहुरिया घूँघट ओढ़े बसे रसे खजूर&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;हीरा पन्ना माणिक गिने रहे शहरसे दूर&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;(परकोटा-अंगार का अंजन)&lt;/p&gt;
&lt;/blockquote&gt;

&lt;p&gt;अर्थात एक पुरूष हृदय में रहता है जो बुद्धि, मन, प्राण एवं भूत तत्व का नियमन करता है।एक पुरूष का निवास सहस्त्रार चक्र पर है जो नाम, रूप, गुण, विशेषण से परे अव्यक्त है। योगारूढ़ होकर जीवभाव से मुक्त होकर ही योगी ब्रह्मभाव में जगता है।&lt;/p&gt;

&lt;h3 id=&#34;श-र-कप-ल-क-क-व-य-म-अल-क-रगत-रमण-यत-एव-प-रत-क-व-ध-न&#34;&gt;श्रीकपिल के काव्य में अलंकारगत रमणीयता एवं प्रतीक विधान&lt;/h3&gt;

&lt;p&gt;कविता योगर्षि की अभिव्यक्ति की, विशेषतः अनुभूतियों के प्राकट्य का कारण रही है। इसमें परंपरागत शास्त्रीय अलंकार एवं छंद आदि की छटा तो नहीं दिखती परन्तु सहज काव्यत्व से विभूषित इनकी कविताओं में अलंकार का दर्शन यत्र-तत्र सुलभता से होता है। कुछ उदाहरण द्रष्टव्य हैंः-&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;उपमाः-&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;blockquote&gt;
&lt;p&gt;चुटकी मृदा नोच कर टीला खाई होय&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;मुट्ठी राख खाई पड़े महार बने जस सोय&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;(ऋतोपदेष-गुलाल)&lt;/p&gt;
&lt;/blockquote&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;विभावनाः-&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;blockquote&gt;
&lt;p&gt;शिरा गुच्छ आकाशमें डाली पत्र धन-छाँव&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;बिन गोबर पानी फले पेट भरे सब गाँव&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;(पाँच पिटारी-अंगार का अंजन)&lt;/p&gt;
&lt;/blockquote&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;अन्योक्तिः-&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;blockquote&gt;
&lt;p&gt;वीचि छुअे पुलिन को फिर भी कैरव उदास&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;अमावस्या में चकवा ऋतुपति मधुप निराश&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;(प्रार्थना-38, गुलाल)&lt;/p&gt;
&lt;/blockquote&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;दृष्टान्तः-&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;blockquote&gt;
&lt;p&gt;अति चकित होगे बन्धु छुटेगा जब शरीर&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;क्या से क्या हो गया हटे मत्स्य जब नीर&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;(गुलाल)&lt;/p&gt;
&lt;/blockquote&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;अनुप्रासः-&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;blockquote&gt;
&lt;p&gt;चपल चन्द्र चंचल चकोरा&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;ढूँढे किनारा माँझी सवेरा&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;(अमृत पराग)&lt;/p&gt;
&lt;/blockquote&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;प्रतीक विधानः-&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;blockquote&gt;
&lt;p&gt;संगमरमर के जगमगाते घरों में&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;रसोईखाना बना रखा है तूने&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;धूल सनी हवा के झोंके में&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;खिड़की खोल रखी है तूने&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;(अमृत पराग)&lt;/p&gt;
&lt;/blockquote&gt;

&lt;p&gt;यहाँ संगमरमर का घर अमूल्य मानव तन का प्रतीक है और रसोईखाना भोगवादी संस्कृति का। धूल सनी हवा का झोंका विषय भोग का प्रवाह है तो खुली खिड़की इन्द्रियों की बहिंर्मुख गति का प्रतीक है।&lt;/p&gt;

&lt;h3 id=&#34;न-ष-कर-ष&#34;&gt;निष्कर्ष&lt;/h3&gt;

&lt;p&gt;लगभग 2100 दोहा, 1500 कविता एवं अनेकानेक गद्य, निबंध के रचनाकार योगर्षि श्रीकपिल साहित्य के सर्वोत्तम उद्देश्य में निरन्तर संलग्न रह न सिर्फ साधक समाज के उपयोगी संसाधन में श्रीवृद्धि कर रहे हैं अपितु साहित्य प्रेमियों के चिर पिपासा की भी तृप्ति कर रहे हैं। आज जब लोकैषणा, वित्तैषणा से ग्रस्त छद्म संतों के विशाल प्रचार-प्रसार माध्यम के कोलाहल में सच्चे विरक्त, आत्मज्ञानी, नैसर्गिक द्रष्टा कवियों की वाणी सत्संगियों के एकांत प्रदेश में सहमी हुई है तो योगर्षि श्रीकपिल के इन प्रत्यक्षानुभूत साहित्य की समीक्षा निश्चय ही शोध कार्य की सार्थकता सिद्ध करेगी, मिथ्याचार का निवारण कर सदाचार को प्रकाशित करेगी।&lt;/p&gt;
</description>
      
    </item>
    
    <item>
      <title>दूध की बाढ़ आई है..</title>
      <link>https://saptrashmi.kapilkanan.org/2020/05/dudh_ki_baadh_aayi_hai/</link>
      <pubDate>Fri, 29 May 2020 22:34:11 +0000</pubDate>
      
      <guid>https://saptrashmi.kapilkanan.org/2020/05/dudh_ki_baadh_aayi_hai/</guid>
      
        <description>&lt;p&gt;आईये आज एक ऐसी कहानी पढ़तें हैं जो हममें से कईयों ने पढ़ी – सुनी होगी, और इस कहानी और इसमे निहित सन्देश की चर्चा हम बाद में करेंगे . तो कहानी इस प्रकार है –  किसी देश के राजा को आदत थी की वो अपना वेश बदलकर अपने राज्य में घूमने निकल जाता और अपने प्रजाजनों का हालचाल लेता . इस प्रकार वो दयालु और परोपकारी राजा, अपनी प्रजा के सुख दुःख से ही अवगत नहीं होता अपितु कहाँ पर कौन सा अधिकारी अपना काम ठीक से नहीं कर रहा इसका भी पता उसे चल जाता, और वो आवश्यक सुधार , जरुरतमंदों की मदद ठीक – ठीक कर पाता .&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;एक दिन राजा ने किसान का वेश धारण किया , और निकल पड़ा पैदल, चलते – चलते कब नगर पीछे छूट गए और गाँव शुरू हो गए, राजा को इसका अहसास न हुआ. वो ग्रामीण जीवन  के सुरम्य और शांत वातावरण का आनंद लेता हुआ और भी आगे निकल गया .&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;नदी , नाले आदि पार करता हुआ वो जंगल पहुँच गया, शाम भी हो आई थी और राजा को भूख भी जोरों की लग आई थी . अब जाकर राजा को होश आया की वो अपने राजधानी से बहुत दूर निकल आया है . राजा रात्रि – विश्राम और भोजन की तलाश में आगे बढ़ता रहा .&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;दूर – दूर तक फैले हुए जंगल और तरह – तरह के जानवरों की आती हुई आवाजें उस रात को और भी भयानक बना रहे थे .  दूर कहीं प्रकाश टिमटिमाता देखकर, राजा उधर ही बढ़ चला .&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;नजदीक पहुँचने पर उसने देखा की एक फूस की कच्ची झोपड़ी के बाहर एक दीपक जल रहा था, भूख से व्याकुल  राजा ने  दरवाजा खटखटाया . भीतर से एक युवा किसान और उसकी पत्नी बाहर आए . राजा ने उन्हें बताया – “ मैं परदेशी हूँ, रास्ता भटक गया, भूख – प्यास से बेहाल हूँ, कुछ खाने और रात्रि – विश्राम की जगह मिल जाए तो बड़ी कृपा होगी . सुबह होते ही मैं चला जाउंगा” .&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;युवा किसान और उसकी पत्नी दोनों असमंजस में थे, उनके पास रात्रि भोजन के नाम पर कुछ सूखी रोटियां थीं जो की खुद उनके लिए भी कम पर रही थी और शयन के लिए सिर्फ एक टूटी हुई खाट, और उस पर अतिथि देवता .&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;किसान की पत्नी ने लोटे में पानी लाकर दिया और अपना सारा भोजन राजा के सामने रख दिया . किसान बोला – “ भाई हम गरीब किसान हैं, आज हमारे पास बस यही कुछ रोटियां हैं.” भूखे राजा को उनकी गरीबी और साफ नीयत दोनों दिखाई दे रही थी पर भूख ने जोर मारी और राजा ने रोटियां खत्म कर दी , पानी पीकर और सूखी रोटियां खाकर आज राजा को असीम शांति मिली .&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;किसान और उसकी पत्नी दोनों ने भूखे रहकर, अपना भोजन उसे दे दिया ये बात राजा से छिपी न रही .  किसान ने टूटी खाट को ठीक करते हुए कहा – “ आप यहाँ रात्रि विश्राम करें, और खुद दोनों बाहर जाकर नीचे धरती पर सो गए .&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;राजा उनकी गरीबी, अतिथि सत्कार , दयालुता से बहुत प्रभावित हुआ . उसने लेटे – लेटे विचार किया की – “ अब मैं वृद्ध हो चला, मेरी कोई संतान भी नहीं जो मेरा उत्तराधिकारी बने, मेरे बाद मेरी प्रजा की देखरेख करे . और किसी को भी अपना उत्तराधिकारी यूँ ही नहीं बनाया जा सकता, किसी दयालु, नेक और प्रजा को संतान समझ कर सेवा करने वाले को ही इस राज्य की बागडोर सौंपी जा सकती है .” राजा को उस युवा किसान में अपनी परछाईं नजर आ रही थी .&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;सुबह होने पर राजा ने किसान को अपना असली परिचय देते हुए अपना अंगूठी भी  उसे दिया और कहा – “ कभी किसी भी प्रकार की दिक्कत हो तो, राजधानी आकर मुझसे जरुर मिलना, द्वारपाल इस अंगूठी को देखकर तुम्हे नहीं रोकेगा .”&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;इस घटना को काफी समय हो चुका . राजा अब भी उस युवा किसान के बारे में सोचता रहता . किसान जिस क्षेत्र में रहता था वहां पर सभी लोग कद्दू की खेती करते थे , और इस वर्ष मौसम के प्रतिकूल होने से सबकी फसल ख़राब हो गई . किसान तो गरीब था ही, फसल ख़राब होने से उसके भोजन पर भी संकट उत्पन्न हो गया . किसान और उसकी पत्नी चिंतित रहते और जैसे – तैसे अपने दुःख भरे दिन काट रहे थे . एक दिन किसान की पत्नी को राजा वाली बात याद आई, उसने किसान को अंगूठी देते हुए समझाया की क्यूँ ना राजा के पास जाकर कुछ मदद माँगी जाय, उन्होंने हमें वचन दिया था . किसान भी उसकी बातों से सहमत हुआ, फिर सशंकित होता हुआ बोला – “ यह तो बहुत पुरानी बात है, क्या राजा को अबतक  अपने वचन स्मरण होंगे ?” पत्नी ने कहा की तुम ये अंगूठी दिखा कर याद दिला देना और माँगने से पहले उनसे वचन मांग लेना जिससे वो बाद में मुकर ना जाएँ .&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;किसान राजधानी आकर, राजा के महल के द्वार पर खरा होकर विस्मय से उसके महल, गुम्बद, नक्काशी आदि देख रहा था . द्वारपाल ने पूछा तो उसने राजा की दी हुई वही अंगूठी दिखाई और राजा से मिलाने की बात की . राजसी अंगूठी देखकर, द्वारपाल ने आदरपूर्वक उसका स्वागत किया और राजा से मिलाने उसे राजदरबार ले गया .&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;किसान को देखते ही राजा प्रसन्न हो उठा, उसने सोचा की अच्छा हुआ ये खुद आ गया, इसे यहाँ राज – पाट समझाकर मैं अब अवकाश लूँगा, इश्वर भजन करूँगा, वानप्रस्थ हो जाऊंगा .&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;राजा ने उससे कुशल - क्षेम  पूछा, किसान ने कहा – “महाराज , अबकी बार हमारी फसल ख़राब हो गई,  बहुत ही मुश्किल आन पड़ी  है , हमलोग भोजन को तरस जातें हैं , आप ने पूर्व में हमें मदद का आश्वासन दिया था , इसीलिए मैं आज यहाँ आया हूँ , आप से कुछ मांगने , परंतु आप पहले मुझे वचन दीजिए की आप मांगने के पश्चात मुकरेंगे नहीं .”&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;राजा के आश्वस्ति के बाद किसान ने माँगा – “ महाराज आप मुझे दो हजार कद्दू दिलवा दीजिये, उसे बेच कर मैं अपना समय काट लूँगा, अगले वर्ष भगवान की कृपा रही तो अच्छी फसल होगी, फिर कोई दिक्कत न होगी . और मुझे कुछ नहीं चाहिए . परंतु महाराज, आप ने, देने का वचन दिया है , आपको दो हजार कद्दू देने ही होंगे .”&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;( &lt;em&gt;किसान, चूँकि कद्दू की खेती करता था, उसके पिता, दादा, परदादा सभी कद्दू की ही खेती करते थे और उसके क्षेत्र में सभी किसान भी कद्दू की ही खेती करते थे, और उसी से उन सभी का जीवन व्यतीत होता था, इसीलिए उसके समझ में कद्दू ही बहुत अनमोल था, उसे कद्दू से बढ़कर, किसी  अन्य वस्तु का भी कोई मोल हो सकता है, ऐसा नहीं लगता था&lt;/em&gt;  )&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;राजा बहुत मायूस हुआ, कहाँ वो, किसान के सेवा भाव, दयालुता, परोपकारी स्वभाव  से प्रभावित होकर उसे अपना सम्पूर्ण राज – पाट देकर, अपना उत्तराधिकारी घोषित कर, अपने राज्य का राजा बनाना चाहता था, और कहाँ किसान अपने कद्दू और राजा मुकर ना जाए, इस बात से सशंकित था . खैर, राजा ने किसान को दो हजार कद्दू और ढेर सारा धन देकर विदा किया और अपने उत्तराधिकारी की तलाश में निकल पड़ा . इस कहानी को हम में से कईयों ने पहले विभिन्न रूप में पढ़ा – सुना होगा, परंतु सिर्फ उस किसान की मुर्खता पर अफसोस कर के रह गए होंगे .&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;लेकिन हमारी बात यहीं पर ख़त्म नहीं हो जाती, श्री गुरुदेव ने लिखा है –&lt;/p&gt;

&lt;blockquote&gt;
&lt;p&gt;&lt;strong&gt;दूध की बाढ़ आई है, कोहरे के देश में &amp;hellip;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;/blockquote&gt;

&lt;p&gt;मतलब भागवत कृपा की, भागवत संयोग का महान क्षण, आया है, परंतु जिस प्रकार सफेद रंग के कोहरे , धुंध के कारण, सफेद रंग का दूध किसी को दिखाई नहीं दे रहा ठीक उसी प्रकार आत्मज्ञानी गुरु के दुर्लभ संपर्क में आकर भी लोग, संसार के रंग में रंगे, ठीक कहानी के उस किसान की भांति, भागवत लाभ नहीं अपितु सांसारिक लाभ की ही आशा रखतें हैं .&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;वो संसार में इस प्रकार लिप्त रहतें है की जिस समय उन्हें,  बिना किसी भगीरथ प्रयत्न, और अधिकारी – अनाधिकारी विचार  के सहज ही आत्मज्ञान प्राप्त हो सकता है, जिस ज्ञान के लिए मुनिजन, जन्मों – जन्मों तक तपस्या करतें हैं, उस दुर्लभ और अमूल्य ज्ञान को छोड़, भागवत प्राप्ति को छोड़, वो सदैव संसार में लिप्त जीव सिर्फ सांसारिक लाभ की ही आशा रखतें हैं .&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;सांसारिक लाभ को ही सर्वोच्च समझने वाले ये लोग दूध की बाढ़ भी आ जाने पर प्यासे ही रह जातें हैं . कोई – कोई ऐसा भी सोचतें हैं की हमें किस प्रकार से ये दुर्लभ प्राप्ति हो सकती है, हम तो उस लायक ही नहीं हैं, &lt;strong&gt;परंतु खुद पर ही संशय करने वाले, ये लोग, आत्मज्ञानी गुरु की उपस्थिति की महत्ता को ठीक - ठीक समझ नहीं पाते .&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;अतः हमें किसान और राजा के इस कहानी से सबक लेकर, विचार करना चाहिए, और इस दिव्य भागवत मुहूर्त में कद्दू (संसार) की चिंता को कुछ देर के लिए ही सही, किनारे छोड़,  दूध के इस बाढ़ (आत्मज्ञानी गुरु के सान्निध्य) में  डूबकर के दुग्धपान ( भगवत कृपा पान )करना चाहिए .&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
</description>
      
    </item>
    
    <item>
      <title>हमारा मानवीय धर्म </title>
      <link>https://saptrashmi.kapilkanan.org/2019/04/hamara-maanviy-dharm/</link>
      <pubDate>Sat, 13 Apr 2019 04:47:50 +0000</pubDate>
      
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        <description>

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;आश्रम&lt;/strong&gt; से प्रकाशित होनेवाली पत्रिका &lt;strong&gt;“सप्त-रश्मि”&lt;/strong&gt; के प्रथम प्रकाशन के लिए सभी सदस्यों को ढेर सारी शुभकामनाएं. ये पत्रिका श्री गुरुदेव के आशीर्वाद और आप लोगों के सतत प्रयास का शुभ फल है.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;इस लेखनी का एकमात्र उद्देश्य अपनी कुछ भावनाओं और अनुभवों को साझा कर आश्रम के अन्य सदस्यों से अपने को जोड़ना और साथ-साथ अपने उत्थान के लिए प्रयास करना है.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;यह शरीर और जीवन हमें ईश्वर से मिला अनोखा व सर्वोत्तम उपहार है और इसे सुन्दर और सफल बनाना हमारा धर्म है.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;यह मानव जीवन हमें स्वयं को परिवर्तित कर विकास के मार्ग में अग्रसरित करने के अनेको अवसर प्रदान करता है. &lt;strong&gt;&lt;em&gt;इसका एकमात्र उद्देश्य आत्म - शुद्धि और पूर्णता को प्राप्त करना है. यह हमारे चेतना के विकास के क्रम में एक दुर्लभ अवसर है,&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt; जिसमें हमें जीवन को उत्तम तरीके से व्यतीत करने के साथ-साथ इसके सर्वोत्तम तरीके की खोज भी करनी होती है, ताकि इस संयोग का अधिकतम लाभ मिले.&lt;/p&gt;

&lt;h3 id=&#34;ख-न-प-न-व-स-वस-थ-य-food-health&#34;&gt;&lt;strong&gt;खान - पान व स्वस्थ्य (Food &amp;amp; Health) -&lt;/strong&gt;&lt;/h3&gt;

&lt;p&gt;एक दुर्बल और बीमार शरीर न तो सांसारिक सुखों का भोग कर सकता है न ही अपने विकास एवं सांसारिक उपलब्धियों को प्राप्त करने के लिए प्रयत्न करने को ही सक्षम है. इसके अलावे  शरीर के अंत होते ही हमारे आत्म - शुद्धी व उन्नति की सारी संभावनाएं समाप्त हो जातीं है. इसलिए ये हमारा प्रथम धर्म है कि हम अपने स्वस्थ्य का उचित ख्याल रखें.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;आजकल हमारा आहार हमारे स्वास्थ्य के बिलकुल प्रतिकूल है. ‘पैकेज्ड-फूड्स’ जिसमें केमिकल्स और प्रिसर्वेटिव्स का प्रयोग होता है, प्रोसेस्ड खाद्य (जैसे तेल, घी आदि) जिसकी शुद्धता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है की इसे बनाने में लगनेवाले कच्चे पदार्थों की कीमत से भी कम दर में ये बजार में उपलब्ध है. वही ‘स्ट्रीट फ़ूड’ का अधिक चलन हो गया है, जिसका हमारे शरीर को पोषण देने में और इसकी वृद्धि में कोई भी योगदान नहीं होता. उल्टा ये हमारे पाचन तंत्र को नुकसान पहुँचाता है और इनसे जुड़े अनेक बीमारियों को आमंत्रित करता है. इन वस्तुओ का निम्न मात्रा में उपभोग या इन्हें पूर्ण  रूप से त्यागना ही उचित है. इनकी जगह पर फलों और सब्जियो का अधिक मात्र में सेवन करना चाहिये. साधारण खाना जैसे दाल, चावल, रोटी, सब्जियाँ जिसमे कम मात्रा में तेल व मसालों का प्रयोग हुआ हो, उसका सेवन और इनसे मिलने वाले पोषण (बैलेंस्ड डाइट) का विचार करना ही अपने शरीर का उचित ख्याल करना है.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;प्रत्येक दिन हल्का-फुल्का व्यायाम  शरीर में स्फूर्ति प्रदान करता है. आजकल अधिकांश लोग अनियमित दिनचर्या का शिकार हो गए है, जिसमे सुबह देर से उठाना, समय - सारणी का अनियमित होना , पुरे दिन आलस और प्रमाद से भरा होना आदि. जिससे हमारी रचनात्मकता, उत्पादकता आदि तो प्रभावित होती ही है साथ में स्वाभाव में चिड़चिड़ापन, अवसाद आदि आ जाता है. कुछ लोग आलसी बने रहते है और कोई व्यायाम नहीं करते या फिर अत्यधिक व्यायाम कर “छै – पैक” व मशल्स बनाने में लगे रहते है, ये दोनों ही हानिकारक है. अधिक व्यायाम उनके लिए उचित हो भी सकता है जो किसी खास प्रोफेशन में है, परन्तु सामान्य लोगो के लिए अनावश्यक है.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;em&gt;&lt;strong&gt;अगर हमारा शरीर स्वस्थ है तो तो जिंदगी सुखद होगी अन्यथा अस्वस्थ शरीर के लिए तो सारे सुख सुविधा और साधनों का भी कोई मोल नहीं.&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;&lt;/p&gt;

&lt;h3 id=&#34;स-ब-ध-क-महत-व-importance-of-relationship&#34;&gt;&lt;strong&gt;संबंधो का महत्व (Importance of relationship) -&lt;/strong&gt;&lt;/h3&gt;

&lt;p&gt;हमारे कुटुंब और रिश्तेदार हमारे मन की प्रसन्नता और शांति के जिम्मेदार होते है.  प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से हमारी उनसे और उनकी हम से कई उम्मीदे जुड़ जाती है. हमारे माता-पिता, भाई-बहन, पत्नी, बच्चे, चाचा-चाची, मामा-मामी, गुरुजन, मित्र, सहकर्मी व अन्य बन्धु- बांधव , इनसे हमारे सम्बन्ध और उनके महत्व को हमें बारीकी से समझाना चाहिये और उनकी मार्यादाओ का ख्याल रखना चाहिये. इनमे उचित समन्वय नहीं होने से हमें बहुत मानसिक कष्ट उठाना पड़ता है.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;ये अक्सर देखने को मिलाता है कि हम एक-दो संबंधो को उचित से ज्यादा महत्व देते है और अन्य संबंधो को भुला देते है, जिससे हम इन संबंधो का सुख नहीं ले पाते तथा उनसे दूरिया बढ़ जाती है. गहरे रिश्तों को नहीं निभाने से लोक मर्यादा में भी कमी आती है. हम पारिवारिक और सामाजिक जीवन में तो असफल होते ही है साथ में हमारा मन भी कलुषित और अशांत रहता है.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;लौकिक मर्यादा और नैतिकता का विचार तथा तदनुरूप व्यवहार हमें संबंधो में उचित समन्वय रखने में मदद करता है. &lt;em&gt;&lt;strong&gt;मैं ये मानता हूँ की शांत और प्रसन्न मन में ही रचनात्मकता का विकास होता है.&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;लोग संबंधो में तनाव को कम करने के लिए उसका तात्कालिक समाधान करते है या कुछ बातो से उन्हें  टालने की कोशिश करते है. यह हमेशा सही नहीं होता है कुछ ‘कनफ्लिक्ट’ की जड़े गहरी होती है जिसे टालने से वह लम्बे अरसे का तनाव होता है और भविष्य में अधिक विकृत रूप में सामने आता है. अतः इसे शरुआत में ही सही और नैतिक निर्णय देकर तथा उसे मूल से समाप्त करने की कोशिश करनी चाहिये. इससे लम्बे समय तक चलने वाले मानसिक संताप और भविष्य के बड़े संघर्ष  से बचा जा सकता है.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;मै इस बात से पूर्ण रूप से सहमत हूँ की हमेशा ये हमारे हाथ में नहीं होता पर हमारा प्रयास यही होना चाहिये.&lt;/p&gt;

&lt;h3 id=&#34;ज-वन-म-ग-ण-और-अन-भव-क-स-चयन-कर-न-क-वस-त-ओ-क&#34;&gt;&lt;strong&gt;जीवन में गुण और अनुभवों का संचयन करे न की वस्तुओं का -&lt;/strong&gt;&lt;/h3&gt;

&lt;p&gt;अक्सर परिवार में बच्चों से पुछा जाता है की वो बड़ा हो कर क्या बनेगा, किन-किन वस्तुओ को खरीदेगा, किन सुविधाओं का उपभोग करेगा, परन्तु वास्तविकता ये है की इन्हें प्राप्त करने में किया गया संघर्ष और प्राप्त अनुभव ही श्रेष्ठ है .&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;संसार में वस्तु संचय करनेवाले बहुत है परन्तु गुणी और अनुभवी लोग उसकी तुलना में बहुत कम. मनुष्य को जीवन में नए अनुभव प्राप्त करने अथवा अपने गुणों में संवर्धन के अवसर को कभी छोड़ना नहीं चाहिये. वस्तुएँ , ख्याति, मान -सम्मान आदि तो इसके ‘बाई-प्रोडक्ट्स’ (उपोत्पाद) है और इनका आना-जाना जीवन में लगा रहता है.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;समाज में अनुभवी और गुणी जनों का ही मान - सम्मान स्थिर बना रहता है. वस्तुए तो किसी को विरासत या दान में भी मिल सकता है. परन्तु गुण तो विरासत में विरले को ही मिलाता है. जीवन में अनुभव और गुणों को प्राप्त करने के लिए सभी को संघर्ष करना ही पड़ता है. इसमें नए अवसर भी गुण और अनुभव के आधार पर ही मिलता है.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;em&gt;&lt;strong&gt;अतः गुण और अनुभव ही सच्ची सम्पति है.&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;&lt;/p&gt;

&lt;h3 id=&#34;कर-म-ह-श-र-ष-ठ-ह&#34;&gt;&lt;strong&gt;कर्म ही श्रेष्ठ है -&lt;/strong&gt;&lt;/h3&gt;

&lt;p&gt;दुनियाभर में कई गुणी और सामर्थ्यवान व्यक्ति अत्यधिक मोह के कारण स्वार्थजनित कर्म में ही पूरी जिंदगी गुजार देते है. वे अपने नैतिक कर्तव्यों के पालन में भी असमर्थ ही होते है.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;वही सुविधाओ और गुणों से वंचित कोई अदना सा व्यक्ति श्रेष्ठ कर्मो को सम्पादित कर लोगो को चकित कर देता है. ये ईश्वर प्रदत लगन ही हमें श्रेष्ठ कर्मो में संलगित करता है.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;हमें यह जीवन बहुत छोटी अवधि के लिए मिला है. इन्हें अपने गुणों को निखारने व श्रेष्ठ कर्मो के संपादन में लगाना चाहिये. क्योंकि हमारी पहुँच सीमित हो सकती है परन्तु , &lt;em&gt;&lt;strong&gt;हमारे कर्मो की पहुँच बहुत दूर तक जाती है.&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;&lt;/p&gt;

&lt;h3 id=&#34;सच-च-प-र-रण-स-र-त&#34;&gt;&lt;strong&gt;सच्ची प्रेरणा स्रोत -&lt;/strong&gt;&lt;/h3&gt;

&lt;p&gt;जब भी बचपन से आज तक कुछ भी सिखने की बात सोचते है तो माता-पिता, शिक्षक, भाई - बहन, मित्र आदि की तस्वीर सामने आती है. क्या ये मूर्तियाँ जो हमें सिखाती हैं हम वही सिखतें है या कुछ और है, जो हमें इनसे सिखलाता है ?&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;इसका उत्तर ये लगता है की हमारी श्रद्धा - जड़ इनसे जुड़ती है तो हमें इनके गुणों को सिखने की प्रेरणा होती है. हमारी अन्तः प्रेरणा ही है जो हमें नए लोगों से मिलाती है और हमारे अन्दर श्रद्धा जगती है उनसे सिखने की. और यही प्रेरणा हमारे अन्दर नए गुणों को विकसित कराती है.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;श्रीगुरुदेव एकबार मुझे बोल रहे थे की “मैं तो फिजिक्स - केमिस्ट्री नहीं जनता ( मैं तो वही दे सकता हूँ जो मेरा विषय है)” . शायद मेरा मन कह रहा था कोई शिक्षक तो किसी खास विषय को समझा सकता है परन्तु अन्तः प्रेरणा हमें इस दुनिया से सिखने के लिए हमेशा हमारे अन्दर के किसी श्रोत से आती है. &lt;em&gt;&lt;strong&gt;यह श्रोत अगर बाहर हमारे सामने हो तो इससे बड़ा ईश्वरीय चमत्कार और क्या हो सकता है. शायद इसीलिए कहा जाता है कि “आत्मज्ञानी गुरु के सान्निध्य से बड़ी ईश्वर-कृपा और कोई नहीं हो सकती”.&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;मुझे इस शरीर और जीवन के प्रति उदासीन रहकर आत्म-उन्नयन की बात समझ में नहीं आती, जबतक हमें इससे भी कारगर कोई अन्य साधन उपलब्ध न हो, जो हमें अभीतक ज्ञात नहीं है. हमें ईश्वर प्रदत ये देह और जीवन मिला है, इसे और अधिक सुन्दर व सफल बनाने के लिए प्रयास करना हमारा मानवीय धर्म है.&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
</description>
      
    </item>
    
    <item>
      <title>प्रथम आलेख</title>
      <link>https://saptrashmi.kapilkanan.org/2019/02/first-post/</link>
      <pubDate>Wed, 13 Feb 2019 11:37:31 +0000</pubDate>
      
      <guid>https://saptrashmi.kapilkanan.org/2019/02/first-post/</guid>
      
        <description>&lt;p&gt;&lt;strong&gt;आज&lt;/strong&gt; अपने आश्रम से प्रकाशित हो रही इस &lt;strong&gt;&amp;ldquo;सप्त रश्मि&amp;rdquo;&lt;/strong&gt; पत्रिका के लिए &lt;strong&gt;प्रथम आलेख&lt;/strong&gt; लिखते हुए अपार हर्ष हो रहा है  । श्री गुरुदेव को नमन कर, उनके द्वारा लिखित विघ्नहर्ता श्री गणेश जी और वाग्देवी माता सरस्वती का ध्यान जो &amp;ldquo;गुलाल&amp;rdquo; में प्रकाशित हो चुका है यहाँ प्रस्तुत करना चाहता हूँ  । और श्री गुरुदेव से प्रार्थना करता हूँ की उनके आशीर्वाद से यह पत्रिका अपने उदेश्य में सफल हो ।&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;center&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;ध्यान&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;उल्का दन्त दृग रक्तधन कर्ण तमाल साया&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;सूढ़ वीची भाल आद्रि वर्ण उषा परिधान पीत&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;हुंकार दामिनी गमन निर्झर चरण चन्द्रकदली&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;उदर अरण्य भुजा वीथि बुद्धि उदधि भाव - शीत&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;/center&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;मैं देवों में अग्रपूज्य गणेश की अभिवंदना करता हूँ जो सुन्दर मनोहर तेजवी में आविर्भूत होकर हमारी बुद्धि को भगवान की ओर उन्मुख कर हमें मुक्ति के पथ , आरूढ करते हैं। गणपति की सम्पूर्ण काया मानों उदीयमान उषा की लालिमा से जल है जिसमें उनका पीला वस्त्र अत्यंत शोभनीय हो रहा है । सूर्य की प्रत्यावर्तित किरणों से चमकते हिम पर्वत के समान देदीप्यमान उनके विस्तृत भाल से नि:सृत सृढ़ का आलोडन मानों उन्मुक्त बहती सरिता की तरंगायत लहर हो जिसके तट पर तारकमण्डल से पतित उल्का की धवल रेखा सा चमकता एकल दन्त गजानन का सौन्दर्य बिखेर रहा है। अपनी करुणापूर्ण दृष्टि से भक्त के मानस में विवेक, प्रज्ञा, विद्या, बुद्धि के वैभव को प्रकट करने वाले एवं वक्र दृष्टि से बिघ्नों के समूह को नाश करने वाले विद्यावारिधि के विशाल आरक्त नयन के उभय कोर पर तमाल शाख की सुखद शीतल छाँव प्रदान करते कर्ण पट जगत में दया, क्षमा का ज्ञान कर रहे हैं ।&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;इस भवाटवी में भटके हुए जन के लिए आपकी विशाल भुजा मानों आत्मा की ओर बढ़ती हुयी राहें हों जो विज्ञान के आलिंगन में जीव को लेकर देवत्व प्रदान करती हैं। आपका विशाल उदर मानों तपोनिष्ठ ऋषियों को प्रश्रय देता किसी अरण्य का विस्तृत क्षेत्र हो जहाँ से सृष्टि में सम्मूर्ण विद्या, कला, विज्ञान का संचरण होता है ।&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;हे गणाधिपति ! आपकी ओजस्वी वाणी की हुंकार मानों आकाश और धरा को प्रकाशित करने वाली विद्युत्प्रभा है जो अज्ञान, कुतर्क, संशय, अश्रद्धा, अचेतना के अन्धकार को क्षण भर में नष्ट कर देती है । जगत में समस्त शक्ति, ज्ञान, चेतना, आनन्द का आधार वही मन्त्र शक्ति है जो विज्ञान रूपी पर्वत की कन्दराओं से फूटकर मन, बुद्धि के धरातल में निर्धारिणी के समान बहती है ।&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;क्षिप्रगति से आत्मभूमि से चलकर प्रकृति भूमि में उतरते आपके युगल चरण मानों चन्द्र ज्योति से निर्मित केले के वृक्ष हों जिनका अप्रतिम सौन्दर्य जगत में ज्ञान जनित भाव की सामंजस्यता, मधुरता, शीतलता का संचार कर रहे हैं।&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;हे बुद्धोदधि ! जन्म-जन्म से पूर्णत्वान्वेषण में स्वाध्याय करती हमारी बुद्धि मानों विश्राम को खोजती विकल चंचल सरिता है जिसकी यात्रा आपके विज्ञान सागर में समाहित होकर ही अंत को प्राप्त करती है ।&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;हे विनायक ! अपने दयार्द्र स्वभाव से सहज कृपालु बन हमारी भव-यात्रा को विराम दिजिए ।&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;center&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;ध्यान&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;em&gt;&lt;strong&gt;शब्द अक्षर स्वर स्वरूपा विद्या दीप जलायी&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;em&gt;&lt;strong&gt;तिमिर मिटाकर वागीश्वरी सिद्धि दी दिलायी&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;/center&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;मैं प्रणाम करता हूँ शब्द, अक्षर, स्वर स्वरूपा वागीश्वरी को जो हमारे चित्त में विद्या रूप में प्रविष्ट हो आत्म ज्ञान का प्रकाशन करती हैं। जीव के जन्मांतरों की अविद्या के अंधकार को मिटाने वाली विद्यालोकप्रदायिनी वागीश्वरी की कृपा से मैने वाक्तत्व की पूर्ण सिद्धि पायी है - मृत्यु के बाद मैं वाग्लोक में अष्टयोगिनियों से युक्त भरतभूमि की प्राप्ति कर नभ तत्व की सिद्धि का आनंदोपभोग करूंगा ।&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;center&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;इसके साथ ही मैं आप सभी पाठक और लेखक जनों का स्वागत करता हूँ । आईये हम सब मिलकर शुरू करते हैं -  &amp;ldquo;सप्त रश्मि&amp;rdquo;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;।। &lt;strong&gt;आरंभ&lt;/strong&gt; ।।&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;/center&gt;&lt;/p&gt;
</description>
      
    </item>
    
    <item>
      <title>Website Build Status Page</title>
      <link>https://saptrashmi.kapilkanan.org/build-status-page/</link>
      <pubDate>Wed, 13 Feb 2019 10:18:17 +0000</pubDate>
      
      <guid>https://saptrashmi.kapilkanan.org/build-status-page/</guid>
      
        <description>&lt;p&gt;&lt;center&gt;
    This image below automatically updates to reflect the current state of our latest production deploy. Our Developers and Editors can use it to monitor errors related to build status after every commit to our repo.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;a href=&#34;https://app.netlify.com/sites/sapt-rashmi/deploys&#34;&gt;&lt;img src=&#34;https://api.netlify.com/api/v1/badges/b0c56c60-867c-4d3b-b395-45879fcf9633/deploy-status&#34; alt=&#34;Netlify Status&#34; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/center&gt;&lt;/p&gt;
</description>
      
    </item>
    
    <item>
      <title>लेखक एवं लेखिकाओं के लिए सूचनाएँ एवं साधन</title>
      <link>https://saptrashmi.kapilkanan.org/for_authors/</link>
      <pubDate>Tue, 12 Feb 2019 17:03:00 +0000</pubDate>
      
      <guid>https://saptrashmi.kapilkanan.org/for_authors/</guid>
      
        <description>&lt;p&gt;&lt;strong&gt;आप अपनी रचनाएँ हमें मेल करें तो निम्नलिखित तथ्यों का ध्यान रखें :-&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;ul&gt;
&lt;li&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;आपनी रचनाएँ हमें office@kapilkanan.org पर भेजें .&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;/li&gt;

&lt;li&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;आपकी रचनाएँ मौलिक हों .&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;/li&gt;

&lt;li&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;रचनाओं का उदेश्य, भाव एवं स्तर  हमारे पत्रिका प्रकाशन के उदेश्य के अनुरूप हो .&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;/li&gt;

&lt;li&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;अगर संपादकीय मंडली के द्वारा आपकी रचनाएँ हमारे पत्रिका के लिए उपयुक्त पाई जायेंगी  तो उसे आपके नाम से ही प्रकाशित की जाएगी . एक बार भेज देने के बाद उसके प्रकाशन से  समबन्धित प्रश्न न करें .&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;/li&gt;

&lt;li&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;रचनाओं के साथ अपना परिचय (बायोडाटा जिसमे आपका पता एवं संपर्क नंबर हो ) एवं फोटो अवश्य भेजें .&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;/li&gt;

&lt;li&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;हमारे पत्रिका में आपकी किसी रचना के प्रकाशित होने के बाद उसके समस्त अधिकार श्री कपिल कानन आश्रम मधेपुर के पास सुरक्षित हो जायेंगे .&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;/li&gt;

&lt;li&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;हमारा यह उपक्रम पूर्णतः अव्यावसायिक है , जिसका उदेश्य जनसामान्य के लिए आध्यात्मिक , धार्मिक तथ्य और श्री गुरुदेव के दैवीय विरासत  को बांटना है , अतः किसी भी प्रकार से धन या पारिश्रमिक की आशा व्यर्थ है .&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;/li&gt;

&lt;li&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;रचनाएँ हिंदी यूनिकोड में लिखी हों और माइक्रोसॉफ्ट वर्ड के प्रारूप में हो .
(क्योंकि वेब पर हिंदी यूनिकोड में प्रकशित होता है तो उसे किसी भी डिवाइस पर पढ़ना सुलभ हो जाता है और हम नवीन तकीनीकी मानकों का उपयोग करतें हैं  )&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;/li&gt;

&lt;li&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;अगर आप यूनिकोड में हिंदी लिखना नहीं जानते और लिगेसी फोंट्स जैसे कृति देव आदि का प्रयोग करते हैं तो आप आसानी से उसे लिख कर यूनिकोड में परिवर्तित कर सकते हैं (नीचे लिंक्स दिये गए हैं जहाँ से आप आसानी से कृति देव से यूनिकोड में परिवर्तन कर सकतें हैं .)&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;/li&gt;

&lt;li&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;और अगर आप हिंदी यूनिकोड में लिखते हैं और उसके लिए गूगल का हिंदी इनपुट टूल प्रयोग करते थे और अब जबकि गूगल ने उसका ऑफलाइन इंस्टालेशन फाईल देना बंद करके सिर्फ ऑनलाइन सेवा देना चालू कर दिया है तो आप दो काम कर सकते हैं -&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;ul&gt;
&lt;li&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;या तो आप नीचे दिए गए लिंक पर जा कर ऑनलाइन लिख सकते हैं&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;/li&gt;

&lt;li&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;या आप गूगल का हिंदी इनपुट टूल का ऑफलाइन इंस्टालर  नीचे दिए गए लिंक से डाउनलोड कर सकते हैं और ऑफलाइन आराम से फोनेटिकली यूनिकोड में हिंदी लिख सकते हैं.&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;/li&gt;
&lt;/ul&gt;&lt;/li&gt;

&lt;li&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;या अगर आप कंप्यूटर पर कार्य नहीं करते तो आप किसी भी कंप्यूटर दक्ष कार्यकर्ता (साईबर कैफे आदि में) से अपनी रचनाएँ टंकित करा कर भी भेज सकते हैं .&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;/li&gt;
&lt;/ul&gt;

&lt;hr /&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;लिंक्स&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;ul&gt;
&lt;li&gt;&lt;p&gt;&lt;a href=&#34;https://www.google.co.in/inputtools/try/&#34;&gt;गूगल हिंदी इनपुट टूल ऑनलाइन&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;/li&gt;

&lt;li&gt;&lt;p&gt;&lt;a href=&#34;https://drive.google.com/file/d/1ZTsBVuFpZdeHpui0ywpalh_IQX54m2Xn/view?usp=sharing&#34;&gt;गूगल हिंदी इनपुट टूल ऑफलाइन इंस्टालेशन फाईल&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;/li&gt;

&lt;li&gt;&lt;p&gt;&lt;a href=&#34;https://sites.google.com/site/technicalhindi/home/converters&#34;&gt;कृति देव से यूनिकोड हिंदी फॉण्ट परिवर्तक&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;/li&gt;

&lt;li&gt;&lt;p&gt;&lt;a href=&#34;https://drive.google.com/file/d/1hb5Hfr9ukuChnEm1TaqatDTyy8lID6_L/view?usp=sharing&#34;&gt;हिंदी राइटर इंस्टालेशन फाईल (एक अन्य फोनेटिक यूनिकोड हिंदी लिखने वाला टूल )&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;/li&gt;
&lt;/ul&gt;
</description>
      
    </item>
    
    <item>
      <title>हमारे बारे में</title>
      <link>https://saptrashmi.kapilkanan.org/about/</link>
      <pubDate>Tue, 12 Feb 2019 17:03:00 +0000</pubDate>
      
      <guid>https://saptrashmi.kapilkanan.org/about/</guid>
      
        <description>&lt;p&gt;&lt;center&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;सप्त रश्मि, श्री कपिल कानन आश्रम मधेपुर के द्वारा प्रकाशित होने वाली एक आध्यात्मिक पत्रिका है । इसके प्रकाशन का उदेश्य आम जनमानस के अंदर मौजूद धार्मिक , आध्यात्मिक जिज्ञासाओं का समाधान प्रस्तुत करना है । योगर्षि श्री कपिल के द्वारा प्रदत्त इस दैवीय विरासत को सभी विद्वजनों के साथ साझा करना है ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;hr /&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;सम्पादक मंडल&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;प्रधान सम्पादक - स्वामी अमितेश&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;उप सम्पादक मंडल&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;रीना दत्ता&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;ब्रह्मचारी मनोज कुमार मिश्र&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;hr /&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;तकनीकी सहयोग&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;विवेक कुमार कर्ण&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;hr /&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;प्रधान कार्यालय सह पत्राचार का पता&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;श्री कपिल कानन आश्रम मधेपुर&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;ग्राम - सिन्दुरपुरा, पोस्ट - नवानी&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;जिला - मधुबनी, बिहार - 847410&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;भारत&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;सम्पर्क - 9709516373&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;ई - मेल - office@kapilkanan.org&lt;/p&gt;

&lt;hr /&gt;

&lt;p&gt;&lt;strong&gt;अन्य कार्यालय&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;श्री कपिल कानन आश्रम मधेपुर&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;ग्राम + पोस्ट - मधेपुर&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;जिला - मधुबनी, बिहार - 847408&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;भारत&lt;/p&gt;

&lt;hr /&gt;

&lt;p&gt;&lt;/center&gt;&lt;/p&gt;
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    </item>
    
  </channel>
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