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    <title>Swami Amitesh on Sapt Rashmi - Voice of the soul seekers from india</title>
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      <title>अर्वाचीन संत साहित्य में योगर्षि श्रीकपिल का अवदान</title>
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      <pubDate>Sat, 30 May 2020 09:14:25 +0000</pubDate>
      
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      <description>विषय-प्रस्तावना हिन्दी साहित्य ही नहीं अपितु विश्व की समस्त साहित्य-संपदा अपने संरक्षण-संवर्धन हेतु संतों का ऋणी रहा है। साहित्यकारों ने यदि साहित्य की काया को सजाया-सँवारा है तो संतों ने इसकी आत्मा का श्रृंगार किया है। प्रत्येक सभ्यता-संस्कृति के पोषण में, उसकी कुरीतियों के निवारण में तत्कालीन समाज के वैसे नायक-नायिकाओं का हम प्रादुर्भाव देखते हैं जो त्याग-बलिदान की उदार भावना से भरे हुए, सांसारिक मोह-माया को तुच्छ मानने वाले, विशाल व्यक्तित्व के धनी रहे हैं। जनसामान्य से हटकर उनमें जो मौलिक, चिंतन, बौद्धिक प्रखरता और अतः प्रेरणा की तीव्रता पाई जाती है वही उन्हें संत कोटि का पद प्रदान करती है। हिन्दी साहित्य का भक्तिकाल यदि कबीर, तुलसी, सूर की महान रचना से स्वर्ण-सिंहासन पर विराजमान है तो अब तक काल-प्रवाह में बहुत से संत का साहित्य किसी अज्ञात क्षेत्र में, स्थानीय स्तर पर ही चेतना क्रांति का संवाहक बना हुआ है। न तो यह समाज की आज सामाजिक-धार्मिक कुप्रथाओं, भेदभाव, छुआछूत, सांप्रदायिक वैमनस्य से मुक्त हुआ है और न ही इन पर कुठाराघात करने वाले संतों की महत्ता गौण हुई है। 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध से लेकर 20वीं शताब्दी तक हमने दयानंद सरस्वती, रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानन्द, रामतीर्थ, मुक्तानन्द, योगानन्द, श्री अरविन्द, महात्मा गांधी, रमन महर्षि, प्रभुपाद जी जैसे अनेकानेक संत विभूतियों का साक्षात्कार किया जिनकी वक्तृता, लेखनी एवं सत्संग-संस्मरण ने भारतीय संस्कृति-सभ्यता के नवोत्थान में अपना अमूल्य योगदान दिया, साथ ही विश्व के अन्य प्रांत में भी वैदिक संस्कृति का झंडा लहराया। स्वातंत्रयोत्तर भारत की ऐसी ही संत विभूतियों में से एक हैं- योगर्षि श्रीकपिल जिनके साधवोचित उत्कृष्ट व्यक्तित्व एवं विलक्षण कृतित्व से आज समस्त हिंदी जगत कृतकृत्य हो रहा है। उनकी रचना का विपुल भंडार हमें 21वीं सदी में प्राप्त हो रहा है जो अपने काव्य-सौंदर्य एवं संदेश की सार्थकता के कारण गहन शोध का विषय बना है। समकालीन आलोचकों एवं शोधार्थियों के दृष्टि-पटल से अनवलोकित ये काव्य-संपदा शोधश्री से विभूषित हो और भी अधिक जनसेवी सिद्ध होगी, इसमें संदेह नहीं है।</description>
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